30.स्थानाष्टक

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स्नानाष्टक



।।पच्चीसवाँ अधिकार।।
(१)
जिसके संबंध मात्र से ही उत्तम पुष्पों की माला भी।
स्पर्श योग्य नहिं रहती है जिसमें मलमूत्र भरा है ही।।
वीभत्स अती दुर्गंधयुक्त रस आदिक से जो बना हुआ।
आत्मा को मलिन करे ये तन फिर वैâसे जल से शुद्ध हुआ।।
सारे जग के जितने पदार्थ अपवित्र इसी में भरे हुए।
फिर वैâसे ये स्नान आदि से मानव के तन शुद्ध हुए।।
(२)
आत्मा स्वभाव से अति पवित्र इससे स्नान को व्यर्थ कहा।
और तन सदैव अपवित्र अत: मन का स्नान भी व्यर्थ कहा।।
जब दोनों ही स्नान व्यर्थ कहते हैं श्री आचार्यप्रवर।
पृथ्वीकायिक औ जलकायिक जीवों के घात से पाप प्रचुर।।
(३)
पूर्वोर्पािजत जो कोटि पाप उससे संबंधित है मिथ्यात्व।
उस ही मिथ्यात्व को जो विवेक से तजता है वह है स्नान।।
पर उससे भिन्न जलादिक से स्नान पाप करने वाला।
जीवों का केवल घात करे ना हो पवित्र नहिं धर्म पला।।
(४)
हे भव्य ! सदा स्नान करो परमात्मा नामक तीरथ में।
जिसमें है सम्यग्ज्ञान रूप जल और तरंगें शुभ निकलें।।
आनंददायि शीतलतायुत और पाप नाश करने वालीं।
गंगा प्रयाग की नदियों से शुद्धता नहीं मिलने वाली।।
(५)
अपने पापों की कृपा से नहिं निश्चय रूपी तालाब दिखा।
निंह समतारूपी नदी दिखी और ज्ञान का सागर नहीं दिखा।।
इसलिए मूर्खजन तीर्थ समझ गंगा नदि में स्नान करें।
पर नहीं वास्तविक तीरथ में जाकर पापों का नाश करें।।
(६)
निंह कोई तीर्थ निंह कोई जल त्रिभुवन में जो तन शुद्ध करे।
क्योंकी अपवित्र शरीर सदा आधी-व्याधी से व्याप्त रहे।।
और सदा ताप करने वाला निंह नाम श्रवण कर सकते हैं।
ऐसे खराब तन को कोई भी शुद्ध नहीं कर सकते हैं।।
(७)
इस जग में जितने तीरथ हैं और उनमें जितनी नदियाँ हैं।
उन सबके भी स्नानों से नहिं शुद्ध हुई ये काया है।।
कर्पूर विलेपन से भी यह निंह हो सुगन्ध दुर्गंध रहे।
चाहे जितनी रक्षा करिए यह सदा नष्ट हो करके रहे।।
अरु यह शरीर नाना प्रकार के दुख को देने वाला है।
इस तन से अधिक न कोई अशुभ हर क्षण दुख देने वाला है।।
(८)
जो प्रबल दर्शनावरण मोह रूपी विषधर से डसे गये।
मिथ्यात्व रूप विष के संबंध से जो प्राणी अति दुखी भये।।
अतएव दृष्टि हो गयी मंद वे सब अमृत का पान करें।
जो ‘‘पद्मनंदि’’ के मुखरूपी चंदा से निकला ज्ञान रहे।।
यह ‘‘स्नानाष्टक’’ रूपी अमृत पीकर सदा सुखी रहिए।
मिथ्यात्व त्याग कर मोहरूप सर्पों से सदा बचे रहिए।।

।।इति स्नानाष्टक।।