30 अगस्त 2017 प्रवचन

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|दशलक्षण पर्व पर-उत्तम शौच धर्म मुम्बई में भक्ति का सागर उमड़ पड़ा है..30 अगस्त

आज पूज्य चंदनामती माताजी ने कल्पद्रुम विधान में बैठे सभी भक्तों को परोक्ष में मांगीतुंगी के ऋषभदेव भगवान, हस्तिनापुर का, जम्बूद्वीप, समवसरण एवं सुमेरु पर्वत के दर्शन कराएं सभी भक्तगण बहुत ही हर्षायमान हुए। आज दशलक्षण पर्व का पंचम दिवस उत्तम शौच धर्म है-पूज्य चंदनामती माताजी ने कुछ पंक्तियों के माध्यम से शौच धर्म के बारे में बताया-जिस गली में न उत्तम धर्म पल सके, उस गली में मुझे नाथ जाना नहीं। पूज्य माताजी ने अपने गुरुणां गुरु को नमन करके और आचार्य, उपाध्याय, साधु परमेष्ठी को भावपूर्वक नमन किया एवं सरस्वती की प्रतिमूर्ति गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी को नमन करते हुए एक छोटे से प्रश्न के साथ शौच धर्म का वर्णन किया- अपने माँ और बाप का, सभी जानते नाम। किन्तु बताओ आज तुम, पाप के बाप का नाम।। सभी भक्तों का एक ही उत्तर था-लोभ, अर्थात् लोभ पाप का बाप करवाना। पूज्य ज्ञानमती माताजी लोभ के बारे में लिखती है, जो लोभ दूरकर उत्तम शौच धर्म को मन में धरते हैं, वे पवित्र हो जाते हैं। हृदय एक कमल है, मन के मंदिर में मन एक कमल है, इक कमल के ऊपर अंतरंग, बहिरंग को पवित्र बनाने वाले मुनियों को और शौच धर्म को हम धारण करते हैं। माताजी ने दशलक्षण भक्ति के अंदर वह पंक्ति सजोई है, शौच धर्म कैसे प्रगट होता है लेकिन उसके साथ-साथ आत्मा के अंदर जो पवित्रता आती है, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती। पवित्रता की कसौटी पर कसकर चार पवित्र चीजें बताई गई| दुनिया में कोष के अंदर कही गई चीजें भूमि से निकला हुआ ताजा जल साफ-सुथरा माना जाता है। पतिव्रता नारी जो भारतीय नारी है, जो अपने पातिव्रत्य धर्म का पालन करती है, जो सीता मैना नारी आदि के पदचिन्हों पर चलकर अपने धर्म का पालन करती है, ऐसी नारी को पवित्र माना जाता है। सीता ने अपने पातिव्रत्य धर्म के कारण ही अग्नि को जल बना दिया। शुचि धर्म परायण राजा पवित्र होता है, जो अन्याय प्रिय राजा होता है, वह हमेशा अपवित्र होता है। ब्रह्मचारी हमेशा पवित्र होता है, अखण्ड ब्रह्मचर्य पालन करने वाले इस पंचमकाल में जन्म लेने वाले ब्रह्मचारी इस लौकान्तिक पर्याय को धारण कर सकते हैं। लोभ को घटाने से मन पवित्र होता है, क्रोध को हटाने से शान्तचित्त होता है। दुनिया वालों मेरी बात जब सुन लेना, इसमें जो १० धर्म में शौच धर्म आता है, उसमें लोभ को घटाने का प्रयत्न करना, अपने तन और मन को पवित्र करे, यही जीवन का सार है। पूज्य ज्ञानमती माताजी ने गौतम गणधर वाणी के पाँचवीं अध्याय में जो निषीधिका दण्डक नाम से जानी जाती है, उस पर विस्तार से बताया। णमो जिणाणं इसका अर्थ क्या है-संसार के कारण कर्मरूप शत्रुओं को जीत लेने वाले जिनदेवों को नमस्कार हो, नमस्कार हो, नमस्कार हो, निषिद्धिकाओं को नमस्कार हो। इसके पश्चात् माताजी ने उत्तम शौच धर्म का अर्थ क्या है-यह सभी भक्तों को बताया। शुचि-पवित्रता का भाव शौच है, अर्थात् अंतरंग के लोभ को दूर करे और जो निर्लोभव्रती देवी है, उसकी नित्य ही उपासना कीजिए। इस व्रत की जाप्य है-ॐ ह्रीं उत्तम शौच धर्मांगाय नम:। माताजी ने प्रवचन के अंत में सभी विधान में बैठे हुए भक्तों को पूरे भारतवासियों को, पूरे विश्व को बहुत-बहुत आशीर्वाद प्रदान किया।