31.ब्रह्मचर्याष्टक

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ब्रह्मचर्याष्टक


।।छब्बीसवाँ अधिकार।।
(१)
जिस मैथुन के करने से ही संसार की ही वृद्धी होती।
एवं समस्त जीवों को जो अत्यन्त दुखी करती रहती।।
जिसे सज्जन पुरुषों ने अपनी पत्नी संग उचित नहीं माना।
फिर दूजी स्त्री के संग में मैथुन बिल्कुल अनुचित माना।।
(२)
जो मैथुन में अति रत रहते साक्षात पशू कहलाते हैं।
इस मैथुन को पशुकर्म कहा विद्वतजन यही बताते हैं।।
गुण दोष विचारे बिना हर समय इसमें जो प्रवृत्त रहता।
उसको अगले भव में पशुगति मिलती ऐसा साधू कहता।।
(३)
सज्जन पुरुषों को यदि अपनी स्त्री संग मैथुन शुभ होता।
फिर पर्व दिनों में वह मैथुन सोचो वैâसे र्विजत होता।।
जिस समय अष्टमी और चतुर्दशि में व्रत धारण करते हैं।
उस समय परायी स्त्री क्या निज स्त्री संग निंह रहते हैं।।
(४)
जब काम की उत्पत्ती होती तब दो तन का मिलाप होता।
और दो अपवित्र शरीरों का आपस में संघर्षण होता।।
उस परिघट्टन से अति अशुद्ध फल की प्राप्ती हो इसीलिए।
थोड़े से सुख की प्राप्ति हेतु आदर के योग्य ना इसीलिए।।
(५)
जब तब आत्मा में मोहनीय कर्मों की प्रबलता रहती है।
चैतन्य का बैरी मोह उसी से काम में प्रीती होती है।।
उसके वश में होकर दोनों अपवित्र रती में रत होते।
इसलिए काम में प्रीती का हरदम निषेध करते रहते।।
(६)
यह संयम रूपी वृक्ष काटने में कुठार की धारा है।
मैथुन में जब तक हो प्रवृत्ति तब तक संयम भी हारा है।।
इसलिए आत्महित की इच्छा करने वाले जो भी जन हैं।
इसका सर्वथा त्याग कर दें तब उनके पलता संयम है।।
(७)
जैसे मदिरा पीने वाले पुरुषों के विकृत भाव रहें।
वैसे ही जो पापी जन हैं हरदम मैथुन के भाव रहें।।
लेकिन यह मैथुन कर्म सभी जीवों का सदा अहित करता।
आत्मा का सुख जो चाह रहा वह इसमें नहीं प्रवृति करता।।
(८)
रे मन तू सदा चपलता तज रति को तजने की कोशिश कर।
क्योंकी ये विषय सौख्य विष सम इसमें नहिं सुख विचार तू कर।।
आचार्य हमें समझाते हैं सुख मान जो इसमें तत्पर है।
इसमें निंह कुशल किसी की है यह विषय भोग सब दु:खकर हैं।।
(९)
जो जन मुमुक्षु हैं एवं जो जन मुक्ति प्राप्ति के इच्छुक हैं।
उनके ही लिए स्त्रियों की संगति निषेध यह अष्टक है।।
पर जो मनुष्यगण रागमयी सरिता में डूबे रहते हैं।
मुझे मुनी जानकर क्षमा करें इसे अच्छा नहीं समझते हैं।।
।।इति ब्रह्मचर्याष्टक।।

।।इति श्री पद्मनंदि आचार्य विरचित पद्मनंदिपंचविंशतिका समाप्त।।