32.उपसंहार

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उपसंहार



तर्ज—माँ बतलाओ आदिनाथ क्यों पूजे जाते हैं..........
पद्मनंदि पंचिंवशतिका को लाई माँ घर में।
सुन सुन करके लिखने का था भाव जगा उर में।।
ज्ञानमती माताजी को पढ़कर वैराग्य हुआ।
छोटी वय में दीक्षा धरकर सब कुछ त्याग दिया।।
मेरे नाना जी ने जब यह ग्रंथ दिया होगा।
सपने में भी उनने ऐसा ना सोचा होगा।।
इसको पढ़कर मेरी पुत्री जनेगी रत्नों को।
‘‘ज्ञानमती’’ सा रत्न दिया है माँ ने जो जग को।।
मात मोहनी को भी इनने ऐसा ज्ञान दिया।
पाल पोसकर तुमने सबको इतना बड़ा किया।।
अब छोड़ो इस घर की बच्चों की ममता माया।
पति का साथ निभाया अब है कुछ दिन की काया।।
इससे तप कर अपना जीवन सफल करो माता।
जिससे जन्म सफल होगा और मिलेगी सुख साता।।
पिता की मृत्युपरांत नगर अजमेर में जब आई।
ज्ञानमती माताजी ने तब दीक्षा दिलवाई।।
इनके पथ पर चलने को थी दो बहनें आर्इं।
और रवीन्द्रर्कीित स्वामी जी जो हैं मेरे भाई।
मात अभयमति और चंदना को सब जग जाने।
इनके त्याग ज्ञान की महिमा से परिचित सारे।।
बड़े बड़े कार्यों को माँ तुमने अंजाम दिया।
जिससे ‘‘दिव्यशक्ति’’ हो ऐसा जग ने नाम दिया।।
तीर्थ ‘‘हस्तिनापुर’’ से लेकर मांगीतुंगी तक।
जो जो रचनाएँ बनवाई नहीं कहीं अब तक।।
मात मोहिनी और पिताश्री छोटेलाल हुए।
तेरह पुत्र पुत्रियों का परिवार बड़ा है ये।।
‘‘मैना’’ सबसे बड़ी और सबसे छोटी हूँ मैं।
सबका लाड़ प्यार है पाया किया पुण्य मैंने।।
मुझको भी इनकी शिष्या बनने का पुण्य मिला।
सबसे छोटी बहन बनी यह भी शुभ योग मिला।।
सन् सत्तर में शास्त्री की शिक्षा दी थी माँ ने।
उस ही शिक्षण का ऋण लौटाया है माँ मैंने।।
नहीं काव्य व्याकरण ज्ञान है अब मुझको माता।
त्रुटी कहीं रह गई अगर हो क्षमा करो माता।।
छोटी मात चंदनाजी से मिली प्रेरणा थी।
‘‘त्रिशला’’ लिखती रहो हमेशा यह ही शिक्षा दी।।
छब्बिस अधिकारों में सारा जग का सार लिखा।
ऐसा ग्रंथ पढ़ा जब मैंने सब कुछ यहीं मिला।।
‘‘पद्मनंदि’’ आचार्य के द्वारा लिखित ग्रंथ है ये।
उसको ही पद्मानुवाद में जो कर पायी मैं।।
कर्मों के शायद मेरे क्षय हुआ बहुत होगा।
पूर्वोर्पािजत पुण्य मेरा ही साथ दिया होगा।।
वरना मैं अज्ञानी कैसे इतना लिख पाती।

जो जो भूल हुई हो मुझसे क्षमा की हूँ प्रार्थी।।