4 सितम्बर 2017 प्रवचन दशलक्षण पर्व के

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दशलक्षण पर्व पर-उत्तम आकिंचन्य धर्म

मुम्बई शहर का चमका भाग्य सितारा

दशलक्षण पर्व में २४ कल्पद्रुम महामण्डल विधान का आयोजन बहुत ही धूमधाम से चल रहा है। आज प्रात:कालीन सभा का शुभारंभ उषा वंदना से प्रारंभ हुआ। तत्पश्चात् उत्तम आकिंचन्य धर्म पर बहुत ही सुन्दर भजन की पंक्तियाँ सुदृढ़मती माताजी ने सुनाई।

घर आकिंचन्य धर्म कर ले, तू शुभ करम भव्य प्राणी, धन्य होगी तेरी जिदंगानी।

पूज्य आर्यिकारत्न श्री चंदनामती माताजी ने कहा-भव्यात्माओं आज दशलक्षण पर्व का नौंवा दिन है, उत्तम आकिंचन्य धर्म देखते ८ दिन पर्व के निकल गये। वज्रनाभि चक्रवर्ति की वैराग्य भावना में बहुत सुंदर पंक्तियाँ संजोई है।

बीजराग फल भोग वे, ज्यो किसान जग मोहि।

त्यों चक्री जग सुख करे, धर्म बिसौरे नाही।

बड़ी प्रेरणास्पद बात कही है कि जैसे चतुर किसान बीज को रखकर के फल का उपभोग करता है, अर्थात् अगली फसल को उगाने के लिए वह थोड़े बीज को रखता है, उसी प्रकार से जो सम्यग्दृष्टी चक्रवर्ती है, वे धर्म को नहीं छोड़कर के सुख का उपभोग करते हैं उन्हें पता होता है यह सुख मुझे धर्म के कारण मिला है अगरा यह धर्म हमने छोड़ दिया तो पिछले जन्म का फल तो हमें मिल जायेगा। लेकिन अगले जन्म में यह सुख हम नहीं प्राप्त कर सकते हैं। संसाररूपी समुद्र से तिरने के लिए पिच्छी, कमण्डलु लेकर जो संत साधु विचरण करते हैं, यह उत्तम आकिंचन्य धर्म का संदेश देता है। आज हमारे सामने आकिंचन्य धर्म को धारण करने वाली पूज्य ज्ञानमती माताजी हमारे सामने विराजमान हैं, हमारे ऊपर इन संतों का महान उपकार है। हम लोगों को भी पर उपकार करना है। यदि हमारे शरीर से थोड़ा भी उपकार हो गया, तो समझ लेना कि शरीर का पाना सार्थक हो गया है।

पूज्य चंदनामती माताजी ने बहुत ही सुन्दर दोहा सुनाया-

चलते को गाड़ी कहते, कहे तत्व को खोया।

कबीर कहते हैं, यहाँ संसार में है कुछ और लोग कहते कुछ और हैं।।

आचार्य शांतिसागर महाराज ऐसे महान आचार्य थे, जिन्होंने आकिचन्य धर्म को जीवन के अंदर स्वीकार करने वाले अपने जीवन के अंदर १० हजार उपवास करके एक सूर्य की तरह रोशनी दी। ऐसे आचार्यश्री का हम सभी पर बहुत ही उपकार है। आज हम संतों के प्रति विनय धारण करने वाले बनें।

पूज्य चंदनामती माताजी ने अपनी गुरु माँ ज्ञानमती माताजी के बारे में कहा-यही हैं|

ज्ञान का मंदिर, कला विज्ञान का मंदिर।

ये मूवी विश्वविद्यालय, हमारी शान का मंदिर।

यहाँ से गूजता है स्वर, सरस्वती माता का सुस्वर।

आ गई ज्ञानमती माता, ये हैं जीवन्त श्रुतमाता।

उन्हीं से लेना है, हमको ज्ञान पीयूष के कुछ कण।

आज भारतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सर्वप्रथम रत्नत्रय व्रत के बारे में बताया कि यह व्रत आज से तीन दिन किया जायेगा। तीन उपवास पर एकासना से आज आज पंचमकाल में द्वादशांग का कुछ अंश उपलब्ध है, गौतम गणधर की चतुर्थकालीन वाणी है, उनके मुख से सर्वप्रथम निकली हुई चैत्यभक्ति है, उनकी संस्कृत की रचना और एक और है, वीरभक्ति जो सम्पूर्ण चर-अचर द्रव्यों को उनके सहभावी गुणों को और क्रमभावी भूत, भावी और वर्तमान सब पर्यायों को भी सदा सर्वकाल अशेष विशेषों को लिए हुए युगपत् काल क्रम से सहित एक साथ प्रतिक्षण जानते हैं, इसलिए उन्हें सर्वज्ञ कहते हैं|

तत्पश्चात् माताजी ने आकिंचन्य धर्म की परिभाषा बहुत सुन्दर कही है- जो शरीर आदि अपने द्वारा ग्रहण किए हुए है, उनमें संस्कार को दूर करने के लिए यह मेरा है, इस प्रकार के अभिप्राय का त्याग करना आकिंचन्य धर्म है। माताजी ने सभी भक्तों से कहा कि इस धर्म की उपासना करके अपने आत्मगुणो को विकसित करो|सभी के लिए बहुत-बहुत मंगल आशीर्वाद है|