5.म्हसवड़ में चातुर्मास, सन् १९५५

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म्हसवड़ में चातुर्मास, सन् १९५५

समाहित विषयवस्तु

१. संयमियों में शिरोमणि आचार्य शांतिसागर जी।

२. आचार्य श्री शांतिसागर जी द्वारा सल्लेखना ग्रहण की खबर।

३. क्षुल्लिका वीरमती का दर्शनार्थ पहला आगमन।

४. आचार्यश्री का आशीष और उपदेश।

५. क्षुल्लिका वीरमती का लौटकर आचार्य श्री देशभूषण से ‘जोबनेर’ में मिलना।

६. गुरु आज्ञा से विहार-फल्टन में श्रुतपंचमी पर अभूतपूर्व प्रवचन।

७. निर्धूम अग्नि का स्वप्न दर्शन।

८. आर्यिकादीक्षा के लिए कुंथलगिरि शांतिसागर जी के पास पहुँचना।

९. आचार्यश्री की आज्ञा मैंने दीक्षा देना छोड़ दिया है, वीरसागर से तुम दीक्षा लो।

१०. लौटकर म्हसवड़ में चातुर्मास।

११. म्हसवड़ में स्वपर कल्याणी ज्ञान का दान।

१२. प्रभावती-सोनूबाई-पढ़कर ज्ञानमती के साथ हुर्इं।

१३. आचार्य श्री शांतिसागर जी समाधिस्थ हुए-वीरमती जी ने दर्शन किए।

१४. म्हसवड़ से जयपुर-वीरसागर के पास।

१५. आचार्य वीरसागर से आर्यिका दीक्षा हेतु निवेदन।

१६. संघ माधोराजपुरा आया।

काव्य पद

जैसे नभ में दिनमणि सूरज, सबसे उत्तम आभावान।

जैसे गिरियों में सुमेरु है, सबसे विस्तृत, तुंग, महान्।।
जैसे सुमनों में गुलाब ही, पाता है नृप का आदर।
वैसे संयम, तपस्त्याग में, श्री आचार्य शांतिसागर।।२५४।।

श्री आचार्य शांतिसागर जी, अतिशय पुण्यवन्त, गुणखान।
करुणा सागर, आगमज्ञाता, महापुरुष, निर्भय, बलवान।।
उपसर्गजयी, लोकोत्तर साधक, चारित्र चक्रवर्ती, ऋषिराज।
साध्वाचार यंत्र दिक्सूचक, मोहतिमिर हर श्री महाराज।।२५५।।

सल्लेखन लेने वाले हैं, वीरमती के श्रवण पड़ी।
उनके दर्शन सुकरणीय हैं, मन उत्कण्ठा हुई बड़ी।।
जब तक श्रीगुरु दर्श नहीं हों, उनने किया नमक का त्याग।
पता चला आचार्यश्री को, दर्शन अनुमति दी महाराज।।२५६।।

विशालमती क्षुल्लिका जी सह, वीरमती जी कृतप्रस्थान।
जयपुर से प्रयाण कर दोनों, रुकी शहर मुम्बई में आन।।
महामुनि श्री नेमिसिंधु के, दर्शन का शुभलाभ लिया।
ऐतिहासिक रथयात्रा देखी, पूना-बाल्हा शमन किया।।२५७।।

बाल्हा से चल नीरा पहुँची, राजित थे आचार्यश्री।
वंदन कर, रत्नत्रय पूछी, दोनों क्षुल्लिका माताजी।।
कौन? क्षुल्लिका वीरमती हैं, वय है केवल विंशति वर्ष।
आचार्यश्री देशभूषण से, दीक्षा ले, पाया उत्कर्ष।।२५८।।

अभी हुए दो वर्ष हैं केवल, सामाजिक जन किया विरोध।
किन्तु गजब की दृढ़ता इनकी, कोई सका न इनको रोक।।
सुन प्रसन्न आचार्यश्री ने, शुभाशीष-सह शिक्षा दीं।
अल्प वयस्का, तीस वर्ष तक, कभी अकेली रहो नहीं ।।२५९।।

अनागार धर्मामृत पीना, अध्ययन करो समय का सार।
भगवती आराधन भी पढ़ना, स्वयं पढ़ा मैं छत्तिस बार।।
शिक्षायें आचार्यश्री की, उत्तम से भी हितू महान्।
कोल्हापुर-बेलगाँव-भ्रमणकर, जयपुर आयीं गुरुस्थान।।२६०।।

जयपुर निकट जोबनेर जा, दर्श किए श्री गुरु महाराज।
पा आशीष, प्राप्त गुरु आज्ञा, पहुँच गर्इं सूरत गुजरात।।
तदनंतर फल्टन में आकर, श्रुतपंचमी का पर्व मना।
श्रुतावतार पर वीरमती ने, दिया प्रथम प्रवचन अपना।।२६१।।

अल्प वयसि, अति सुंदर प्रवचन, वाह! वाह! जन शब्द किया।
चातुर्मास यहीं पर करने, आग्रह-अनुनय विनय किया।।
जिसके मन जो गहरे बसता, वहीं उसे दिखता दिन-रात।
निर्धूम अग्नि को जलते देखा, वीरमती ने स्वप्न प्रभात।।२६२।।

आर्या दीक्षा लेकर के मैं, बढूँ आचरण के पथ पर।
बारम्बार विशुद्धि आती, आत्म चित्रवत् के अवसर।।
आचार्यश्री से कुन्थलगिरि में, किया निवेदन दया निधान।
भवदधि से मुझ पार लगाने, आर्यिका दीक्षा करें प्रदान।।२६३।।

श्री कुंथलगिरि सिद्धक्षेत्र है, सुंदर एक पहाड़ी पर।
देशभूषण-कुलभूषण मुनिवर, यहाँ से मुक्ति गये तपकर।।
बने हुुए हैं सात जिनालय, आदि-बाहुबली-नंदीश्वर।
श्री आचार्य शांतिसागर जी, आये तन तजने नश्वर।।२६४।।

श्री आचार्य शांतिसागर जी, सुना निवेदन भली प्रकार।
बोले त्याग दिया है मैंने, दीक्षा देना सभी प्रकार।।
यम सल्लेखन धारण कर मैं, पट्ट दे दिया वीर यती।
उनसे जाकर, दीक्षा लेना उत्तर अम्मा वीरमती।।२६५।।

आचार्य श्री की वाणी सुन मन, उमड़ी भाव विशुद्धि तभी।
अहो! आर्यिका दीक्षा लेना, मैं तो चाहूँ अभी-अभी।।
किन्तु रोकना पड़ा स्वयं को, बीच पड़ा है चातुर्मास।
श्री गुरु की सल्लेखन लखकर, मुझको पुण्य कमाना खास।।२६६।।

श्रीगुरु का उद्बोधन पाकर, अपना जीवन धन्य किया।
सामाजिक अतिशय आग्रह पा, म्हसवड़ चातुर्मास किया।।
चातुर्मास बीच में जाकर, आचार्यश्री के दर्श किए।
सल्लेखन आरूढ़ क्षपक लख, लोचन-जीवन धन्य किया।।२६७।।

क्षुल्लिका माता वीरमती ने, चतुर्मास उपयोग किया।
स्व-पर कल्याणक, मुक्ति प्रदायक, ज्ञानदान उद्योग किया।।
ज्ञानदान तो सब दानों में, रखता है वैशिष्ट्य महान्।
जितना देते उतना बढ़ता, घट जाता यदि करें न दान।।२६८।।

किन्तु जिन्हें मंजिल है प्यारी, वे रुकते हैं बीच नहीं।
यहाँ से चल बारामती पहुँची, थे शांति सिंधु आचार्य यहीं।।
मोक्ष शास्त्र-तत्त्वार्थसूत्र है, उमास्वामी पीयूष कलश।
भरा हुआ है इसके भीतर, जिनवाणी का अमृत-रस।।२६९।।

सप्ततत्त्व जिनवाणी गाये, उनका वर्णन सूत्र प्रधान।
टीका-भाष्य-वार्तिक-इस पर, बड़े-बड़े विरचे विद्वान्।।
इसका पाठन माताजी ने, सुष्ठुतया सम्पन्न किया।
ज्ञानसूर्य को उद्घाटित कर, भव्यों का उपकार किया।२७०।।

नेमिचंद आचार्यश्री का, द्रव्य संग्रह लघु प्राकृत ग्रंथ।
षट्द्रव्यों का वर्णन इसमें, सुष्ठुरूप वर्णित निग्र्रंथ।।
जिनवाणी का हार्द समझने, यह ग्रंथ है नींव समान।
इसको आत्मसात् करके ही, ज्ञान महल चढ़ते विद्वान्।।२७१।।

माताजी श्री वीरमती ने, सब रहस्य बतलाया है।
जहाँ द्रव्य षट् पाये जाते, वही लोक कहलाया है।।
कातंत्रव्याकरण भी माताजी, चातुर्मास पढ़ाया है।
उत्तम ज्ञानक्षयोपशम लखकर, जनसमूह हर्षाया है।।२७२।।

हुर्इं प्रभावित प्रभावती जी, सोनूबाई, सुहागवती।
अध्ययन कर श्रीवीरमती से, हो गई दोनों ज्ञानवती।।
जीवन में संयम धारण कर, पूज्य आर्यिका पद पाया।
समाधिस्थ जिनमति-पद्मावति, नाम साध्वियों में आया।।२७३।।

आचार्यश्री शांतिसागर जी, सल्लेखन आरूढ़ रहे।
भादों शुक्ला दोज के प्रात:,सिद्धनमन समाधिस्थ हुए।।
म्हसवड़ से जा वीरमती जी, रहीं उपस्थित कुंथलगिरि।
करती रहीं क्षपक के दर्शन, भाव विशुद्धि बढ़ाये उर।।२७४।।

वैराग्यभाव को धारे उर में, म्हसवड़ पुनरागमन किया।
राजगिरा रोटिका, चावल, छोड़ अन्न सब त्याग दिया।।
चातुर्मास अनंतर जयपुर, पधरार्इं श्री वीरमती।
गुरु आज्ञा पा मिलीं संघ, आचार्य प्रवर श्री वीरयती।।२७५।।

आचार्य श्री वीरसागर से, किया निवेदन माताजी।
पुण्य आर्यिका दीक्षा देकर, उपकृत करें महाराजश्री।।
ठहरो अभी, संघ में रहकर, समाचार समझो-जानो।
अनुभव करो संघचर्या का, देंगे दीक्षा तब मानों।।२७६।।

वीरमती मन था उतावला, दीक्षा जल्दी मिल जाये।
एक-एक दिन लगे वर्ष-सा, चैन नहीं मन में आये।।
सोचा जब तक समय न पकता, वृक्ष नहीं फल पाते हैं।
जो उतावला, वही बावला, बुद्धिमान बतलाते हैं।।२७७।।

बीत गये कुछ माह इस तरह, ऊहा-पोह विचारों में।
सोना वही खरा होता है, जो तपता अंगारों में।।
जो उन्नति के मतवाले हैं, सब्र रखें, नहिं करें त्वरा।
कर विहार संघ जयपुर से, पहुँचा माधोराजपुरा।।२७८।।