5 लब्धियों में करणलब्धि का विशेष विवरण

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5 लब्धियों में करणलब्धि का विशेष विवरण

लेखिका - आर्यिका गंभीरमती माताजी

अनादिकालीन संसार में दो धाराए (मार्गं) है 1.संसारधारा 2. मोक्षधारा । इसका दरवाजा सम्यक्त्व से ही खुलता है सम्यक्त्व के बिना मोक्षमार्ग प्रारभ्भ ही नहीं होता है अर्थात् ये मुख्य है अथवा मोक्ष -मार्ग पर आरूढ होने के लिए सर्वप्रथम ये जमीन का काम करता है अर्थात् सम्यग्दर्शन भूमिस्वरूप है इसकी प्राप्ति पाँच लब्धि होने पर ही होती है वो पाँच लब्धि निम्नलिखित है-

1. क्षयोपशमलब्धि 2.विशुद्विलब्धि 3.देशनालब्धि 4.प्रायोग्य लब्धि 5.करण लब्धि। आदि की चार लब्धि साधारण है भव्य-अभव्य दोनो को होती है किन्तु पाँचवी लब्धि भव्य के ही सम्यक्त्व प्राप्त करते समय होती है करण लब्धि के होने पर सम्यक्त्व नियम से होता है।

1- क्षयोपशम लब्धि का स्वरूप- कर्मो के मलरूप जो अप्रशस्त ज्ञानावरणादिक कर्मो का समूह अनन्त -भाग हीन होकर अर्थात् अनन्त का एक भाग प्रमाण होकर क्रम से उदय आता है तब कर्मो के अनुभाग की अनन्त बहुभाग प्रमाण हानि होती उस समय ही क्षयोपशम लब्धि होती है। उत्कृष्ट अनुभाग के अनंतवे भाग का अनंत बहुभाग मात्र जो देशघाती स्पर्धक के उदय होते हुए भी उत्कृष्ट अनुभाग का अनंत बहुभाग मात्र जो सर्वघातीस्पर्धक उनके उदय का अभाव वह तो क्षय और उन्ही सर्वघातीस्पर्धकों (भविष्यकाल में उदय आने वाले) का जो उदय अवस्था को प्राप्त नहीं उनका सत्ता में कर्मस्वभाव रूप रहना वो ही उपशम लब्धि की प्राप्ति सो क्षयोपशम लब्धि है। क्षयोपशम लब्धि में यथायोग्य घाति और अघाति सभी अप्रशस्त कर्मो सम्बन्धी अनुभाग शक्ति की प्रतिसमय अनन्त गुणहानि होना विवक्षित है।

क्षयोपशम एवं क्षयोपशम लब्धि में अन्तर-

1.क्षयोपशम केवल देशघाति प्रकृतियों में ही होता है किन्तु क्षयोपशम लब्धि में प्रत्येक समय अनुभाग का अनंत गुणा द्यटना ये कार्य सर्व घात कर्मो में व अघाति कर्मो की अप्रशस्त प्रकृति में होता रहता है ।

2.क्षयोपशम में तो देशघाति कर्मो का जितना अनुभाग है उतना उदय में आता है परन्तु क्षयोपशम लब्धि में प्रत्येक समय अंनत भाग होकर उदय में आता है।

3.क्षयोपशम निरंतर विधमान रहता है सोते हुए बेहोश अवस्था मे भी रहता है परन्तु क्षयोपशम लब्धि मात्र अन्तमुर्हूर्त पर्यन्त ही से जागृत अवस्था मे रहती है।

2- विशुद्धि लब्धि का स्वरूप-आदि लब्धि (क्षयोपशम लब्धि) होने पर साता आदि प्रशस्त (पुण्य) प्रकृतिया के बन्धयोग्य जो जीव के परिणाम है वह विशुद्धि लब्धि है।

3- देशना लब्धि का स्वरूप- छह द्रव्य और नव पदार्थ का उपदेश देने वाले आचार्य आदिक का लाभ यह तृतीय लब्धि है।

करणलब्धि का स्वरूप-

प्रायोग्य लब्धि के पश्चात अभव्य के योग्य परिणामों को उल्लंधन कर भव्य जीव क्रमशः अधः प्रवृत्त करण, अपूर्वकरण करता है।

प्रत्येक करण का काल अन्तर्मुहूर्त है। अनिवृत्तिकरण का काल सबसे छोटा है उससे अपूर्व करण का काल संख्यातगुणा है। उससे अधः प्रवृत्त का काल संख्यात गुणा है।

अधः प्रवृत्तकरण का स्वरूप- जिस कारण से अधःस्तनीवर्ती कोई जीव के विशुद्व परिणाम उपरितन समयवर्ती कोई जीव के विशुद्ध परिणाम सदृश होते है इसलिए इसका नाम अधः प्रवृत्तकरण है।

उदाहरण - एक जीव ने अधः प्रवृत्तकरण किया दूसरे समय में पहुँचने पर उसके जैसे परिणाम होते है वैसपरिणाम अधः प्रवृत्त प्रारभ्भ करने वाला कोई दूसरा जीव पहले समय में प्राप्त करते है। इस प्रकार आगे वाले और पीछेवाले जीवों के परिणामों में समानता पाये जाने से इस करण को अधः प्रवृत्त करण कहते है। यह अधः करण परिणाम नाना जीवों की अपेक्षा है। प्रथम समय सम्बन्धी प्रथम पुंज के परिणाम और अन्तिम समय सम्बन्धी अन्तिम पुंज के परिणाम ये किन्ही परिणामोें के सदृश नही होते है। अन्य जितने भी परिणाम है वे यथायोग्य सदृश भी होते है और विसदृश भी होते है।अधः प्र्रवृत्त करण में गुणश्रेणी, गुणसंक्रमण, स्थिति काण्डक घात और अनुभाग काण्डक घात नहीं होते है।अधः प्रवृत्तकरण मे प्रति समय अनंतगुणी विशुद्व बढती जाती है। और सातादि प्रशस्त प्रकृतियों का चतुःस्थानीय (गुड-खांड, शर्करा और अमृत) अनुभाग बन्ध होता है और असातादि अप्रशस्त प्रकृतियोंका द्विस्थानीय (लता-दारू या निंब-कांजीर) अनुभाग बंध होता है।अंक सदृष्टि के अनुसार प्रथम समय के चारों खण्डो में 162 परिणाम पाये जाते है, उनमें से प्रथमखण्ड में एक से लेकर 39 तक 39 परिणाम, दूसरे खण्ड में 40 से लेकर 79 मे 40 परिणाम, तीसरे खण्ड में 80 से लेकर 120 तक 41 परिणाम और चोैथे खण्ड में 121 से 162 तक 42 परिणाम परिगणित किये गये है। इनमें से प्रथमखण्ड का 1 संख्याक परिणाम विशुद्वि की अपेक्षा सबसे स्तोक है, उससे दूसरे खण्डका 40 संख्याक जधन्य परिणाम अनन्तगुणा है, उससे तीसरे खण्ड का 80 संख्याक जधन्य परिणाम अनन्तगुणा है और उससे चैथे खण्ड का 121वॉ जधन्य परिणाम अनन्तगुणा है।

अधः प्रवृत्तकरण का काल अन्तर्मुहूर्त है जो अंक संदृष्टि से 16 लिया गया है। कुल परिणाम असंख्यात लोक प्रमाण है जो 3072 माने गये है से सब परिणाम प्रथम समय से लेकर अन्तिम समय तक उत्तरोत्तर समान वृद्वि को लिए हुए है इस हिसाब से यहाँ वृद्वि या चय का प्रमाण 4 है। प्रथम स्थान में वृद्वि का अभाव है, इसमें प्रथम समय को छोडकर 15 समयों मे वृद्वि हुई है, अतः व्येक पदार्धघ्नचय गुणोगच्छ चयधनं इस सूत्र के अनुसार एक कम पद चय गच्छ का चय धन का प्रमाण होता है 15चय धन सर्व धन - चयधन आदिधन 3072-480-2592 आदिधन प्राप्त हुई आदिधन-प्रथम समयवर्ती परिणामों की संख्या 2592 -162 प्राप्त हुई प्रथमसमयवर्ती परिणाम की संख्या प्लश चय द्वितीय समय परिणामो की संख्या 162-4 166 लब्ध प्राप्त हुआ है आगे इसमें चय 4 के उत्तरोत्तर मिलाने पर तीयादि समयोें के परिणामोे का प्रमाण क्रम से 170,174,178,182,186, आदि होता है 16 वे समय परिणामोंका प्रमाण 222 होता है। अनुकृष्टि रचना इस प्रकार है-

अनुकृष्टि-रचना

समय परिणाम का प्रथम खण्ड द्वितीय खण्ड तृतीय खण्ड चतृर्थ खण्ड

क्रम.संख्या प्रमाण
16 222 54 55 56 57
15 218 53 54 55 56
14 214 52 53 54 55 -4-निर्वगणाकाण्डक
13 210 51 52 53 54
12 206 50 51 52 53
11 202 49 50 51 52- 3- निर्वगणाकाण्डक
10 198 48 49 50 51
 9 194 47 48 49 50
 8 190 46 47 48 49
 7 186 45 46 47 48- 2- निर्वगणाकाण्डक
 6 182 44 45 46 47
 5 178 43 44 45 46
 4 174 42 43 44 45
 3 170 41 42 43 44-1- निर्वगणाकाण्डक
 2 166 40 41 42 43
 1 162 39 40 41 42
 1- 39 40-79 80-120 121-162

असंख्यात लोक मात्र षट्स्थान पतित वृद्वि असंख्यात लोक बार है काल अन्तमुर्हूर्त अंकसंदृष्टि में-पृथक पृृथक खण्ड के परिणाम की असंख्यात लोक मात्र है अधः प्रवृत्तकरण का 16 समय, निर्वर्गणाकाण्डक में चार समय, प्रतिसमयचय का प्रमाण -4, प्रतिखण्डचय का प्रमाण -1 निर्वगणाकाण्डकों की संख्या -4 अधःप्रवृत्तकरण के काल में प्रतिसमय अधिक क्रम लिए हुए असंख्यात लोक प्रमाण परिणाम होते है। विशेष (चय) को प्राप्त करने के लिए अन्तर्मुहूर्त प्रमाण प्रतिभाग है। उस अधः प्रवृत्तकरण काल के (समयों के) संख्यातवें भाग प्र्रमाण अनुकृष्टि रचनाका आयाम है और जितना वह आयाम है उतने समयों का एक निर्वर्गणाकाण्डक होता है।निर्वर्गणा काण्डक के समान प्रतिसमय के परिणामों के क्रमशः खण्ड होते है, वे खण्ड अधिक क्रम होते है। यहाँ विशेष को प्राप्त करने का प्रतिभाग अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है। प्रत्येक खण्ड में असंख्यात लोक प्रमाण परिणाम है।

प्रत्येक खण्ड में षट्स्थान पतित वृद्वि असंख्यात लोक बार होती है। एक-एक विशेष (चय) में भी षट्स्थान पतित वृद्वि असंख्यात लोक बार होती है। प्रथम समय का प्रथमखण्ड और चरम समय का अन्तिम खण्ड ये विसदृश और शेषखण्ड सदृश है।चरम समय क सर्वखण्ड और प्रथम समय से लेकर द्विचरम समय पर्यन्त का सर्वप्रथम खण्ड,यह अधःर्प्रवृत्तकरण में असदृश खण्डों की पंक्ति है। प्रथम करण (अधःकरण) में निर्वर्गणा काण्डक प्रमाण समयो में प्रत्येक समय के प्रथमखण्ड के जघन्य परिणाम ऊपर-ऊपर अनन्त गुणे क्रम से है। निर्वर्गणाकाण्डक के चरम समय सम्बन्धी जघन्य परिणामसे प्रथम समय का उत्कृष्ट परिणम अनन्त गुणा है, उससे द्वितीय निर्वर्गणा काण्डक के प्रथम समय के प्रथम खण्ड का जघन्य परिणाम अनन्तगुणा है इस प्रकार जधन्य से उत्कृष्ट और उससे जघन्य सर्प की चाल वत् अनन्त गुणे क्रम से है।

अपूर्व करण - जिसमें प्रतिसमय अपूर्व-अपूर्व परिणाम होते है उसे अपूर्व करण कहते हे इसका काल अन्तर्मुर्हूत है जो अधः प्रवृत्त करण के काल के संख्यातवे भाग प्रमाण है इस काल में कुल परिणाम असंख्यात लोकप्रमाण होकर भी प्रत्येक समय के परिणाम भी असंख्यात लोक प्रमाण होते है। वे सब परिणामप्रथम समय से लेकर अन्तिम समय तक उत्तरोत्तर सदृश वृद्वि को लिए हुए है।

प्रथम समय की जघन्य विशुद्वि सबसे स्तोक है। उसी समय में प्राप्त होने वाली उत्कृष्ट विशुद्वि असंख्यात लोक प्रमाण षट्स्थानों को उल्लंघन कर प्राप्त होती है, इसलिए प्रथम समय की जघन्य विशुद्वि से यह उसी समय की उत्कृष्ट विशुद्वि अनन्तगुणी है। उससे दूसरे समय मे प्राप्त होने वाली जघन्य विशुद्वि अनन्तगुणी है जो मात्र अनन्त गुणवृद्वि रूप न होकर असंख्यात लोक प्रमाण षट्स्थान रूप विशुद्वि को उल्लंघन कर अवस्थित है।

अपूर्वकरण परिणाम के कार्य विशेष - अपूर्व करण के प्रथम समय से लेकर जो चार आवश्यक कार्य प्र्रारभ्भ होते है वे ये है- 1. गुणश्रेणी 2. गुण संक्रम, 3. स्थिति काण्डक घात 4. अनुभाग काण्डक घात।

इतना विशेष है कि मिथ्यात्व का अन्तर करण करने के बाद उसकी प्रथम स्थिति आवली और प्रत्यावली अर्थात् दो आवली प्रमाण शेष रहनें पर उसका गुण श्रेणी रूप से द्रव्य का निक्षेप नही होता,क्योंकि आवली और प्रत्यावली प्रमाण प्रथम स्थिति के शेष रहने के एक समय पूर्व ही आगाल प्रत्यागाल का होना बन्द हो जाता है।

गुण श्रेणी निर्जरा का स्वरूप - गुणित रूप से उत्तरोत्तर समय में कर्म परमाणुओं का झरना (निर्जीण होना) गुण श्रेणी निर्जरा है। गुण शब्द का अर्थ गुणाकार है तथा उसकी श्रेणी आवली या पंक्ति का नाम गुणश्रेणी है। परिणामों की विशुद्वि की वृद्वि से उपरितन स्थिति में स्थित परमाणुओं का अपकर्षण करके अन्तर्मुहूर्तकाल पर्यन्त प्रतिसमय उत्तरोत्तर असंख्यात गुणित वृद्वि के क्रम से कर्मप्रदेशों की निर्जरा के लिए रचना होती है उसे गुणश्रेणी कहते है।

गुण श्रेणी आयाम - जितने निषेको मे असंख्यात गुणश्रेणी रूप से प्रदेशों का निक्षेपण होता है वह गुणश्रेणी आयाम कहलाता है।

गुण श्रेणी दो प्रकार की है 1. गलितावशेष 2. अवस्थित गलितावशेष गुणश्रेणी- जिसमें अधस्तन एक एक निषेक के गलित होते जाने के कारण उत्तरोत्तर गुण श्रेणी निक्षेप मे एक-एक समय कम होता है उसकी गलितावशेष गुणश्रेणी निक्षेप संज्ञा है


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7. निषेकों की गलितावशेष नम्बर 1 का निषेक कल जाने पर 6 गुणश्रेणी निषेकों की गुणश्रेणी गुण संक्रमण - जहाँ पर प्रतिसमय असंख्यात गुणश्रेणी क्रम से परमाणु प्रदेश अन्य प्रकृति रूप परिणमे, उसे गुण संक्रमण कहते है।

स्थितिखण्डन - (स्थिति कांडकघात)- कर्मो की स्थिति के उपरिम अंश, खण्ड या पोरों को खरोंचकर नष्ट कर देने को स्थिति-खण्डन या स्थितिकाण्डक घात कहते हैं। स्थिति काण्डक घात के द्वारा कर्मो का स्थिति सत्व कम हो जाता है। आयुकर्म को छोडकर शेषकर्मो का स्थिति घात होता है।

अनुभाग काण्डकघात - कर्मों के अनुभाग के उपरिम अंश,खण्ड या पारों को खरोंचकर नष्ट कर देने को अनुभाग खण्डन या अनुभाग काण्डक घात कहते है अनुभाग काण्डक घात के द्वारा कर्मो कर अनुभाग सत्व कम हो जाता है।इसके प्रत्येक समय में एक ही परिणाम होता है, इसलिए इस करण का जितना काल हैै उतने इसके परिणाम जानने चाहिए।

अनिवृत्ति करण - नाना जीवो के परिणाम में निवृत्ति अर्थात् परस्पर भेद जिसमें नहीं है अनिवृत्तिकरण है इस करण में प्रत्येक समय में नाना जीवों के एक सा ही परिणाम होता है। अनिवृत्तिकरण में भी स्थितिकांडक घात, अनुभाग कांडक घात, स्थिति बंधापसरण, गुणश्रेणी ये सभी क्रिया अपूर्वकरणवत् होती है, किन्तु इनका प्रमाण अन्य होता है। अनिवृत्तिकरण का संख्यातवा भाग शेष रह जाने पर दर्शन मोहनीय कर्म का अन्तकरण करता है।

अन्तरकरण - प्रथमा स्थिति और उपरितन स्थिति के मध्य की अन्तमुहूर्त प्रमाण स्थिति के निषेकों का उक्त स्थितियों में निक्षेपण करके अभाव करना अन्तर करण कहलाता है ।

अन्तकरण क्रिया सम्पन्न होने के बाद द्वितीय स्थिति में स्थित दर्शन मोहनीय कर उपसम(उदय के अयोग्य) करता है। तदनन्तर प्रथम स्थिति के गलने के बाद अन्तर के प्रथम समय में यह जीव प्रथमोपशम सम्यग्दृष्टि हो जाता है ।