6.आचार्य श्री देशभूषण जी का टिकैतनगर में शुभागमन

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आचार्य श्री देशभूषण जी का टिकैतनगर में शुभागमन

समाहित विषयवस्तु

१. संत आगमन से नगर हर्षित।

२. मैना द्वारा प्रथम बार मुनिदर्शन।

३. मैना ने आचार्यश्री को अपनी प्रतिभा से प्रभावित किया।

४. आचार्यश्री का केशलोंच देख मैना के मन में भी केशलोंच के भाव।

५. आचार्यश्री का विहार-साथ में जाने का मैना का विचार।

६. मैना द्वारा घर पर ही छहढाला, रत्नकरण्ड आदि कण्ठस्थ करना।

७. आचार्यश्री के शुभाशीष से घर पर ही साधना करना।

काव्य पद


संत राष्ट्र के भाग्यविधाता, पथदर्शक, मंगलकर्ता।
प्रेम बरसता है नयनों से, वाणी से अमृत झरता।।
जग कल्याण वास करता है, उनके शुभाशीषमय हाथ।
निम्बवृक्ष चंदन हो जाता, यदि रहता चंदन के साथ।।१४४।।

गंगा पाप शमन करती है, चंद्र शमन करता है ताप।
कल्पवृक्ष हर लेता सबका, दु:ख-हीनता का संताप।।
सबको हरले युक्ति न कोई, हमें दिखाई देती है।
किन्तु अकेली संत की संगति, तीनों को हर लेती है।।१४५।।

संत नगर में जब आते हैं, आ जाता है स्वत: बसंत।
सुख-संस्कृति मुस्काने लगती, हो जाता पापों का अंत।।
संत जगा देते सोतों को, जागों को कर देय खड़ा।
खड़े हुओं की नस के भीतर, देते तेज खून दौड़ा।।१४६।।

श्री आचार्य देशभूषण जी, टिकैतनगर जब पधराये।
जैन दिगम्बर मुनि के दर्शन, प्रथम बार मैना पाये।।
संत हमारे नगर पधारे, यह सौभाग्य हमारा है।
पा उनका सान्निध्य मोह का, मिटा सघन अंधियारा है।।१४७।।

यथा दिवाकर के उगने से, खिल जाते हैं पंकज-वन।
तथा यतीश्वर के दर्शन से, खिले सकल भव्यों के मन।।
मैना ने माता संग जाकर, दर्शन-प्रवचन लाभ लिया।
सहस्रनाम स्तोत्र सुना कर, गुरु अमृत उपहार दिया।।१४८।।

सहस्रनाम स्तोत्र अलौकिक, सकल मनोरथ करता पूर्ण।
प्रकृति तीर्थंकर बंध-सुकारण, करता कर्म प्रकृतियाँ चूर्ण।।
इसका प्रतिदिन पाठ करो तुम, आचार्यश्री आशीष दिया।
सुन मैना के पाठ भक्ति से, प्रतिदिन करना शुरू किया।।१४९।।

आचार्यश्री के केशलुंच का, हुआ भव्यतम आयोजन।
जैनाजैन सकल जनता का, पुलकित हुआ विरागी मन।।
मन ही मन मैना यों बोली, कृपा करो मुझ पर भगवन्।
अचिर दिवस आये जीवन में, मैं भी करूँ केशलुंचन।।१५०।।

डूब गई चिन्तन में मैना, ऐसा दिन कब पाऊँगी।
तोड़ सकल जग द्वंद्व-मोह, मैं निज आतम को ध्याऊँगी।।
जिनवर दीक्षा धारण करके, पंचमहाव्रत धारण कर।
आतम का कल्याण करूँगी, श्रीगुरु चरणों में जाकर।।१५१।।

रमता जोगी, बहता पानी, आचार्यश्री का हुआ विहार।
धरती-अम्बर लगे गूंजने आचार्यश्री की जय-जयकार।।
मैना का मन चाह रहा था, आचार्यश्री के संघ चलूँ।
येन-केन-विध गुरुचरणों में, जाकर जिनवर दीक्षा लूूँ।।१५२।।

काल लब्धि बिन कार्य न होता, विद्वज्जन का सही कथन।
गृह पिंजड़े में बंद रह गई, मैना देवी मारे मन।।
स्त्री पर्याय की निंदा करती, पूरी देर रोती-रोती।
दृढ़ प्रतिज्ञ संघ मिल जाती, अगर कहीं मैना होती।।१५३।।

आचार्य श्री देशभूषण का, धर्मवृद्धिमय पा आशीष।
रत्नकरण्ड, कण्ठस्थ कर लिया, ली छहढाला मैना सीख।।
जिसको गहरी प्यास लगी हो, कर लेता है कूप खनन।
जिज्ञासू घर में रहकर भी, कर लेता है ज्ञानार्जन।।१५४।।

जैसे मिट्टी पानी पाकर, मृदुता को पा जाती है।
शास्त्रों के अभ्यास से वैसे, बुद्धि प्रखर हो जाती है।।
पद्मनंदिपंचविंशतिका, मात दिये धार्मिक संस्कार।
सबने मिलकर मैना जी के, खोले मुक्तिमार्ग के द्वार।।१५५।।

आचार्यश्री के शुभाशीष से, रहने लगीं साधनारत।
प्रातसामायिक, जिनवर पूजन, शुद्ध असन का पाला व्रत।।
मुझे एक दिन गृह पिंजरे से, निश्चित ही उड़ जाना है।
यही मनौती करके मैना ने, यह नियमित व्रत ठाना है।।१५६।।

अनुज रवीन्द्र की वय दो वर्ष थी, खाता-पीता मैना हाथ।
हिला-मिला था पय-पानी ज्यों, सोता था मैना के साथ।।
जीजी कहीं चली न जाये, आँचल रखता हाथ गहे।
रोने लगता यदि सुन लेता, जाने के भी शब्द कहे।।१५७।।

माता-पिता, भाई-भगिनी सब, महामोह में डूबे थे।
पर विरागिनी मैना के पल, कटते ऊबे-ऊबे से।।
नाथ! परम करुणा के सागर, गृह-कूप से निरवारो।
करावलम्ब देकर के स्वामिन्। जगत्महोदधि से तारो।।१५८।।

व्याकुल पक्षी पंख फड़फड़ा, चाह रहा था उड़ जाना।
किन्तु खड़ी ऊँची दीवारें, रोक रहीं बाहर जाना।।
बाहर नहीं सुरक्षा कुछ भी, खड़े भेड़िये खाने को।
ऐसे में वैराग्य विवश था, मन मसोस रह जाने को।।१५९।।