7 सितम्बर 2017 प्रवचन रत्नत्रय व्रत

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रत्नत्रय व्रत

आज दस दिवसीय दशलक्षण महापर्व का समापन अनंत चतुर्दशी के साथ हो गया। आज पूज्य आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने पंचपरमेष्ठी स्तुति बहुत ही मधुर स्वर से जो कि माताजी के द्वारा यह स्तुति की रचना की गई है-

णमो अरिहंताणं, नमन है, अरिहंत पद को

णमो सिद्धाणं में, नमन कर लूँ सिद्ध पद को

णमो आइरियाणं, नमन हैं आचार्य गुरु को

णमो उवज्झायाणं, नमन है, उपाध्याय गुरु को

णमो लोए सव्वसाहूणं पद बताता

नमन जग के सब साधुओं को करूँ जो है त्राता।

चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज से लेकर उनकी परम्पराओं तक नमन करते हुए एवं गुरु माँ को नमन करते हुए दिवस का शुभारंभ हुआ है। भव्यात्माओं! आज देश के अंदर दशलक्षण पर्व के समापन के पश्चात् रत्नत्रय व्रत करने वालों के लिए आज अंतिम दिवस है। अर्थात् ३२ दिन अनादिपर्व सोलहकारण, मेघमाला व्रत, श्रुतस्कंध, जिनमुखावलोकन १ महीने के लगातार व्रत हुए हैं। समय-समय पर ज्ञानमती माताजी ने व्रतों के मंत्रोच्चारण भी करवाया। २४ कल्पद्रुम महामण्डल विधान का आयोजन मुम्बर्ई महानगर में चल रहा है। सभी भक्तों ने बहुत ही हर्षोल्लास के साथ अंतिम जयमाला के साथ महान यज्ञ का समापन किया। बंधुओं धर्मधारण करने की वस्तु होती है। पूज्य चंदनामती माताजी ने धर्म की व्याख्या बताई। एक नवयुवक धर्म की व्याख्या करने के लिए निकलता है। एक सैनिक के पास पहुँचता है। वह युवक सैनिक की धर्म की व्याख्या पूछता है| सैनिक कहता है कि देश की रक्षा करना हमारा धर्म है।

एक पंडित के पास पहुँचता है, धर्म की व्याख्या पूछने-पंडित कहते हैं| कि शास्त्र की गद्दी परद बैठना, प्रवचन सुनना, समाज से भेंट लेना यही मेरा धर्म है। सभी अपने-अपने अनुसार धर्म की व्याख्या करते हैं। वह नवयुवक एक संत के पास पहुंचता है- महाराज आप धर्म की व्याख्या बताइये। संत ने उस भव्यात्मा को ऊपर से नीचे तक देखते हुए जाना यह निकट संसारी है। उत्तमे सुखे धरति इति धर्म:-संसार के दु:ख से निकालकर जो परम उत्कृष्ट सुख से पहुंचाता है, वह धर्म है, वही रत्नत्रय रूप धर्म है। सम्यग्दर्शन जिसका मूल धर्म है, चारित्रधर्म है, रत्नत्रय को भी धर्म कहा गया है। एक कुरल काव्य नाम का ग्रंथ है, तमिल भाषा का ग्रंथ है-उसमें आचार्य कुन्दकुन्द देव लिखते हैं- जहां धर्म का साम्राजय होता है, जिस घर के अंदर प्रेम की प्रमुखता होती हे, उस घर के अंदर संतोष, पीयूष की वर्षा होती है। आप सब गृहस्थ हैं, किसी के साथ वैरभाव न रखें, पारस्परिक, सौहाद्र्र का परिचय दें। यही रत्नत्रय का दशधर्मों का सार है।

आज पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी ने सोलहकारण मंत्र का उच्चारण कराया। तत्पश्चात् रत्नत्रय व्रत पर प्रकाश डाला। भव्यात्माओं रत्नत्रय व्रत अनादि निधन मंत्र है, अनादिकाल से इन धर्मों का आश्रय लेकर अनंतानंत प्राणी अपने को तीर्थंकर बना चुके हैं और परम्परा से निर्वाण को प्राप्त हो चुके हैं। रत्नत्रय धर्म में सर्वप्रथम सम्यग्दर्शन के बारे में बताया सम्यग्दर्शन के ८ अंग होते हैं। सम्यग्ज्ञान भी मुख्य रूप से ८ प्रकार का माना है। स्वाध्याय के द्वारा हम ज्ञान को समीचीन ज्ञान बना सकते हैं। सम्यक्चारित्र में साधुओं के २८ मूलगुण बताये हैं। इस प्रकार से यह रत्नत्रय आत्मा को शुद्ध करके ३ रत्न तीन लोक की सम्पत्ति को प्राप्त कराने वाले हैं। आपका मानव जीवन जो पंचमकाल में भी रत्नत्रय को प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ है, बहुत ही जन्म पुण्य संचित किया है। इसी तरह रत्नत्रय की आराधना होती रहे, ये पर्व सभी के लिए बहुत-बहुत मंगलकारी हो, सभी के लिए आशीर्वाद है।