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भक्ति आराधना


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अक्षय तृतीया


अक्षय तृतीया

जगद्गुरू भगवान ऋषभदेव ने दीक्षा लेकर छह महीने का योग धारण कर लिया था। जब छह महीने पूर्ण हो गये, तब वे प्रभु मुनियों की चर्याविधि बतलाने के लिये आहारार्थ निकले। यद्यपि भगवान को आहार की आवश्यकता नहीं थी, फिर भी मोक्षमार्ग को प्रगट करने के लिये पृथ्वीतल पर विचरण करने लगे।

उस समय लोग दिगम्बर मुनियों के आहार की विधि को नहीं जानते थे। अत: कोई-कोई भगवान के पास आकर उन्हें प्रणाम करते और उनके पीछे-पीछे चलने लगते, कोई बहुमूल्य रत्न लाकर भगवान के सामने रखते और ग्रहण करने की प्रार्थना करते कि हे देव! प्रसन्न होइये और स्नान करके भोजन कीजिये। कोई हाथी, घोड़ा, पालकी आदि वाहन लेकर आते और भेंट करते। कितने ही लोग रूप-यौवन सम्पन्न कन्याओं को लाते और कहते कि प्रभो! आप इन्हें स्वीकार कीजिये। आचार्य कहते हैं कि इन लोगों की मूर्ख चेष्टा को धिक्कार हो, जो ऐसी-ऐसी चेष्टा कर रहे थे। इस प्रकार जगत में आश्चर्यकारी गूढ़चर्या से भ्रमण करते हुए भगवान के छह मास और व्यतीत हो गये।

क्रमशः...

भजन


भजन

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तर्ज—एक परदेशी मेरा.........




प्रभु ऋषभदेव का आहार हो रहा,
हस्तिनापुरी में जय-जयकार हो रहा।। टेक.।।

प्रथम प्रभू का प्रथम पारणा, प्रथम बार जब हुआ महल में। हुआ......
पंचाश्चर्य की वृष्टि हुई थी, चौके का भोजन अक्षय हुआ तब।। अक्षय......
भक्ति में विभोर सब संसार हो रहा,
हस्तिनापुरी में जय-जयकार हो रहा।।१।।

भरत ने नगरी अयोध्या से आकर, श्रेयांस का सम्मान किया था। सम्मान......
दानतीर्थ के प्रथम प्रवर्तक, कहकर उन्हें बहुमान दिया था।। बहुमान ......
राजा के महलों में मंगलाचार हो रहा,
हस्तिनापुरी में जय-जयकार हो रहा।।२।।

क्रमशः...

कार्यशाला


जैन इन्साइक्लोपीडिया : जैन समाज हेतु एक विशिष्ट उपलब्धि!

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दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापूर द्वारा संचालित इस बहुआयामी प्रोजेक्ट को देश की सर्वोच्च जैन साध्वी "पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी" की प्रेरणा एवं आशीर्वाद तथा योजनाप्रमुख "पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका रत्न श्री चंदनामती माताजी" का संपादकत्व प्राप्त होने से इसकी सफलता एवं सार्थकता स्वतः ही स्पष्ट है।
प्रारंभिक रुप में यह ऑनलाइन विश्वकोश विकिपीडिया की तर्ज पर आधारित मीडिया विकी सॉफ्टवेयर में विकसित किया गया एक मात्र अनुपम प्रोजेक्ट है। इस विशाल प्रोजेक्ट से परिचित कराने हेतू पूज्य चंदनामती माताजी की प्रेरणा एवं आदेशानुसार रविवार दिनांक २० मार्च से दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान के तकनीकी "सचिव इंजि. रितेश जैन दोशी, भांडुप मुंबई" द्वारा कार्यशाला का आयोजन हर रविवार को ४:०० से ४:४५ तक भगवान ऋषभदेव झूम चॅनेल पर किया जा रहा है। भारत देश के अनेको प्रांत से युवा वर्ग🧑‍💻🧑‍💻👩‍💻👩‍💻 काफी रुचिपूर्वक इस कार्यशाला में भाग ले रहे है।
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उपन्यास स्वाध्याय प्रतियोगिता


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कृतिकर्म प्रयोग विधि


कृतिकर्म प्रयोग विधि /कायोत्सर्ग विधि

अथ देववन्दनाक्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भावपूजा-वंदनास्तवसमेतं चैत्यभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम् ।

(इस प्रतिज्ञा वाक्य को बोलकर साष्टांग या पंचांग नमस्कार करके खड़े होकर मुकुलित हाथ जोड़कर तीन आवर्त एक शिरोनति करके मुक्ताशुक्ति मुद्रा से हाथ जोड़कर सामायिक दण्डक पढ़ें।)

सामायिक दण्डक

णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व साहूणं||

चत्तारि मंगलं - अरिहंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहु मंगलं, केवलि पण्णत्तो धम्मो मंगलं ।

चत्तारि लोगुत्तमा - अरिहंत लोगुत्तमा, सिद्ध लोगुत्तमा, साहु लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमा ।

चत्तारि सरणं पव्वज्जामि - अरिहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्ध सरणं पव्वज्जामि, साहु सरणं पव्वज्जामि, केवलि पण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वज्जामि
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चक्रवर्ती भरत की 31फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित


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भरत चक्रवर्ती सिद्ध भगवान का परिचय


भरत चक्रवर्ती सिद्ध भगवान का परिचय

युग की आदि में भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थंकर हुए हैं और उनके ज्येष्ठ पुत्र ‘‘भरत’’ चक्रवर्ती हुए हैं। भरत का अपने पिता तीर्थंकर ऋषभदेव के समान ही चैत्र कृ. नवमी के दिन जन्मे थे। यशस्वती महादेवी ने रात्रि के पिछले प्रहर में ६ स्वप्न देखे थे-सुमेरु पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, हंससहित सरोवर, चंचल लहरो वाला समुद्र, ग्रसित होती हुई पृथ्वी देखा। ये सब मंगल स्वप्न देखने से तुम्हारे चक्रवर्ती पुत्र का जन्म होगा। माता यशस्वती के स्तन का पान करता हुआ जब भरत दूध के कुरले को बार-बार उगलता था, तब ऐसा लगता कि मानों वह अपना यश ही दिशाओं में बांट रहा है।

क्रमश:

आज का दिन - १० मई २०२१ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक १० मई २०२१
तिथी- वैशाख कृष्ण १४
दिन- सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४७
विक्रम संवत- २०७८

सूर्योदय ०५.५५
सूर्यास्त १८.५२


अथ वैशाख मास फल विचार

भ. नमिनाथ - मोक्ष कल्याणक ​

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