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भक्ति आराधना


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पूजा


ज्येष्ठ जिनवर पूजा

[ज्येष्ठ जिनवर व्रत में]
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नाभिराय कुल मण्डन मरुदेवी उर जननं।
प्रथम तीर्थंकर गाये सु स्वामी आदि जिनं।।
ज्येष्ठ जिनेन्द्र न्हवाऊँ सूरज उग्र भणी।
सुवरण कलशा भराऊँ क्षीरसमुद्र भरणी।।१।।

जुगला धर्म निवारण स्वामी ऋषभ जिनम्।
संसार सागर तारण सेविय सुर गहनं।।
ज्येष्ठ जिनेन्द्र न्हवाऊँ सूरज उग्र भणी।
सुवरण कलशा भराऊँ क्षीरसमुद्र भरणी।।२।।

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इन्द्र इन्द्रानी देवा देवी बहु मिलनी।
मेरु जिनेन्द्र न्हवायो महोत्सव जै करनी।।
ज्येष्ठ जिनेन्द्र न्हवाऊँ सूरज उग्र भणी।
सुवरण कलशा भराऊँ क्षीरसमुद्र भरणी।।३।।

गणधर, ऋषिवर, यतिवर, मुनिवर ध्यान धरं।
आर्यिका, श्रावक, श्राविका, पूजत चरण वरं।।
ज्येष्ठ जिनेन्द्र न्हवाऊँ सूरज उग्र भणी।
सुवरण कलशा भराऊँ क्षीरसमुद्र भरणी।।४।।

ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं श्रीआदिनाथजिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।


निर्मल शीतल नीर उदक यह पूजरयं।
कर्म मलय सब टारी आतम निर्मलयं।।
ज्येष्ठ जिनेन्द्र न्हवाऊँ सूरज उग्र भणी।
सुवरण कलशा भराऊँ क्षीरसमुद्र भरणी।।५।।

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ॐ ह्रीं आदिनाथजिनेन्द्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा।

क्रमशः
पर्यावरण


पर्यावरण : जैनदर्शन एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण

द्वारा -

डॉ. सनत कुमार जैन (मोबा:०९३०२१०५६४५)

डायरेक्टर, आई,आई,ई.एम.आर., इंदौर

पर्यावरण, दो शब्दों –परि = चारो ओर एवं आवरण = ढंका हुआ, से मिलकर बना है| साधारण भाषा में हम कह सकते है कि हमारे आसपास या चारो ओर द्रश्य एवं अदृश्य वातावरण, जीव व अजीव पदार्थो की मौजूदगी और उनमे आपसी संबंध ही हमारा पर्यावरण है| पृथ्वी पर पर्यावरण अनन्तकाल से विद्यमान है| इसे वैज्ञानिकों व धर्मगुरुओं ने समझने एवम् समझाने का प्रयास किया है व मान्यताओं के अनुसार इसकी विवेचना की है| प्रस्तुत आलेख में पर्यावरण के विभिन्न पहलुओं एवं महत्व को जैन मतानुसार एवं पर्यावरण विज्ञान की द्रष्टि से एक तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है|

जैनदर्शन

जैनाचार्यों के अनुसार वर्तमान में हम जैनधर्म के २४वें तीर्थंकर श्री १००८ तीर्थंकर महावीरजी के जिनशासन के आधीन हैं एवं समवशरण में खिरी दिव्य ध्वनि द्वारा सभी जीवों को दिए हितोपदेश का सभी अनुसरण कर रहे हैं | इसे जिनवाणी या द्वादशांग वाणी कहा जाता है | इस द्वादशांग वाणी को लिपिबद्ध करने का कार्य ईसा की प्रथम व द्वितीय शताब्दी में जैनधर्म के महान आचार्यों १०८ आचार्य श्री कुन्द्कुंद स्वामी व १०८ आचार्य श्री उमास्वामी द्वारा ग्रंथों में किया गया | महावीर के सिद्धांतों में जियो और जीने दो, अहिंसा परमोधर्म: एवं अपरिग्रह प्रमुख हैं, जो यह दर्शाते हैं कि जैनधर्म में पर्यावरण को बहुत महत्व दिया गया है एवं इसे विस्तारपूर्वक समझाया गया है| साथ ही पर्यावरण संरक्षण के विषय में काफी लिखा गया है |

क्रमशः...

कार्यशाला


जैन इन्साइक्लोपीडिया : जैन समाज हेतु एक विशिष्ट उपलब्धि!

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दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापूर द्वारा संचालित इस बहुआयामी प्रोजेक्ट को देश की सर्वोच्च जैन साध्वी "पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी" की प्रेरणा एवं आशीर्वाद तथा योजनाप्रमुख "पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका रत्न श्री चंदनामती माताजी" का संपादकत्व प्राप्त होने से इसकी सफलता एवं सार्थकता स्वतः ही स्पष्ट है।
प्रारंभिक रुप में यह ऑनलाइन विश्वकोश विकिपीडिया की तर्ज पर आधारित मीडिया विकी सॉफ्टवेयर में विकसित किया गया एक मात्र अनुपम प्रोजेक्ट है। इस विशाल प्रोजेक्ट से परिचित कराने हेतू पूज्य चंदनामती माताजी की प्रेरणा एवं आदेशानुसार रविवार दिनांक २० मार्च से दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान के तकनीकी "सचिव इंजि. रितेश जैन दोशी, भांडुप मुंबई" द्वारा कार्यशाला का आयोजन हर रविवार को ४:०० से ४:४५ तक भगवान ऋषभदेव झूम चॅनेल पर किया जा रहा है। भारत देश के अनेको प्रांत से युवा वर्ग🧑‍💻🧑‍💻👩‍💻👩‍💻 काफी रुचिपूर्वक इस कार्यशाला में भाग ले रहे है।
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सम्यग्ज्ञान पत्रिका



व्रत


ज्येष्ठ जिनवर व्रत

ज्येष्ठकृष्ण पक्षे प्रतिपदि ज्येष्ठशुक्ले प्रतिपदि चोपवास:, आषाढ़कृष्णस्य प्रतिपति चोपवास:, एवमुपवासत्रयं करणीयम्, ज्येष्ठमासस्यावशेषदिवसेष्वेकाशनं करणीयम्, एतद्व्रतं ज्येष्ठजिनवरव्रतं भवति। ज्येष्ठप्रति-पदामारभ्याषाढकृष्णाप्रतिपत् पर्यन्तं भवति।

अर्थ-ज्येष्ठ कृष्णा प्रतिपदा, ज्येष्ठशुक्ला प्रतिपदा और आषाढ़ शुक्ला प्रतिपदा, इन तीनों तिथियों में तीन उपवास करने चाहिए। ज्येष्ठ मास के शेष दिनों में एकाशन करना होता है। इस व्रत का नाम ज्येष्ठ जिनवर व्रत है। यह ज्येष्ठ कृष्णा प्रतिपदा से आरंभ होता है और आषाढ़ कृष्णा प्रतिपदा को समाप्त होता है।

विवेचन-ज्येष्ठजिनवर व्रत ज्येष्ठ महीने में किया जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ कृष्णा प्रतिपदा से प्रारंभ होता है और आषाढ़ कृष्णा प्रतिपदा को समाप्त होता है। इसमें प्रथम ज्येष्ठवदी प्रतिपदा को प्रोषध किया जाता है, पश्चात् कृष्ण पक्ष के शेष १४ दिन एकाशन करते हैं। पुन: ज्येष्ठ सुदी प्रतिपदा को उपवास और शेष १४ दिन एकाशन या आषाढ़ वदी प्रतिपदा को उपवास कर व्रत की समाप्ति कर दी जाती है।

क्रमशः

उपन्यास स्वाध्याय प्रतियोगिता


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स्वाध्याय के लिए क्लिक करें...

पंचकल्याणक


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श्रुत आराधना महोत्सव



श्रुत आराधना महोत्सव-आज 14 जून को मध्याह्न 3.30 बजे
पारस चैनल एवं भगवान ऋषभदेव जूम चैनल पर

सानिध्य - गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी

द्वारा- प्रज्ञाश्रमणी आर्यिकारत्न श्री चंदनामती माताजी

श्रुत पंचमी पावन पर्व की पूर्व बेला में दिनांक 14 जून 2021 को दिन में 3:30 बजे से श्रुत आराधना महोत्सव का आयोजन किया गया है, जिसमें आपको जैन पुस्तकालयों में विराजित पूर्वाचार्यों द्वारा रचित जैन साहित्य, ताड़ पत्र पर लिखे गए धवला,तत्वार्थ सूत्र,सोने चांदी आदि की पांडुलिपियों के दर्शन होंगे एवं सभी ग्रंथों को अर्घ्य भी चढ़वाया जाएगा, अतःआप अपने और अपने बच्चों की स्मरण शक्ति बढ़ाने हेतु इस सरस्वती की आराधना में अवश्य भाग लें ।

ध्यान दें- श्रुत पंचमी पर्व- ज्येष्ठ सुदी पंचमी, दिनांक 15 जून 2021 को है, श्रुत आराधना का यह कार्यक्रम एक दिन पूर्व रखा गया है।

विशेष सूचना- अगर आपके यहां भी यदि जैन पुस्तकालय हैं तो आप भी उनके दर्शन भगवान ऋषभदेव जूम चैनल के माध्यम से जुड़ कर करा सकते हैं । उसके लिए हमें नीचे दिए गए व्हाट्सएप नंबर पर सूचित करें

whatsapp no.8171351392

BRZ Zoom Channel link

Meeting id - 8110081008
Password - 1008

अजितनाथ भगवान


अजितनाथ भगवान का परिचय
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परिचय

इस जम्बूद्वीप के अतिशय प्रसिद्ध पूर्व विदेहक्षेत्र में सीता नदी के दक्षिण तट पर ‘वत्स' नाम का विशाल देश है। उसके सुसीमा नामक नगर में विमलवाहन राजा राज्य करते थे। किसी समय राज्यलक्ष्मी से निस्पृह होकर राजा विमलवाहन ने अनेकों राजाओं के साथ गुरू के समीप में दीक्षा धारण कर ली। ग्यारह अंग का ज्ञान प्राप्त कर दर्शनविशुद्धि आदि सोलहकारण भावना का चिंतवन करके तीर्थंकर नामकर्म का बंध कर लिया। आयु के अन्त में समाधिमरण करके विजय नामक अनुत्तर विमान में तेंतीस सागर आयु के धारक अहमिंद्र हो गये।

गर्भ और जन्म

इन महाभाग के स्वर्ग से पृथ्वीतल पर अवतार लेने के छह माह पूर्व से ही प्रतिदिन जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र की अयोध्या नगरी के अधिपति इक्ष्वाकुवंशीय काश्यपगोत्रीय राजा जितशत्रु के घर में इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा की थी। ज्येष्ठ मास की अमावस के दिन विजयसेना ने सोलह स्वप्नपूर्वक भगवान को गर्भ में धारण किया और माघ शुक्ल दशमी के दिन अजितनाथ तीर्थंकर को जन्म दिया। देवों ने ऋषभदेव के समान इनके भी गर्भ, जन्मकल्याणक महोत्सव मनाये।

तप

अजितनाथ की आयु बहत्तर लाख पूर्व की, शरीर की ऊँचाई चार सौ पचास धनुष की और वर्ण सुवर्ण सदृश था। एक लाख पूर्व कम अपनी आयु के तीन भाग तथा एक पूर्वांग तक उन्होंने राज्य किया। किसी समय भगवान महल की छत पर सुख से विराजमान थे, तब उल्कापात देखकर उन्हें वैराग्य हो गया पुन: देवों द्वारा आनीत ‘सुप्रभा' पालकी पर आरूढ़ होकर माघ शुक्ल नवमी के दिन सहेतुक वन में सप्तपर्ण वृक्ष के नीचे एक हजार राजाओं के साथ बेला का नियम लेकर दीक्षित हो गये।
प्रथम पारणा में साकेत नगरी के ब्रह्म राजा ने पायस (खीर) का आहार देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किये।
क्रमश:

आज का दिन - २१ जून २०२१ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २१ जून २०२१
तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ११
दिन- सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४७
विक्रम संवत- २०७८

सूर्योदय ०५.४६
सूर्यास्त १९.१०


अथ ज्येष्ठ मास फल विचार



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०-९ अं
परिमार्जित क्ष त्र ज्ञ श्र अः


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