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मिथ्यादृष्टि के ध्यानसिद्धि संभव नहीं


मिथ्यादृष्टि के ध्यानसिद्धि संभव नहीं है!

श्री शुभचन्द्राचार्य ने ‘‘ज्ञानार्णव’’ नामक ग्रंथ में ध्यान का प्रमुखता से विचेन किया है। ज्ञान ± अर्णव: अर्थात् ज्ञान का समुद्र। कहने का तात्पर्य यह है कि ध्यान के द्वारा ही ज्ञानरूपी समुद्र में गोता लगाया जा सकता है। प्रस्तुत ग्रंथ में ध्यान का वर्णन करते—करते आचार्यश्री कहते हैं कि आकाश में पुष्प और गधे के सींग कदाचित् हो सकते हैं परन्तु गृहस्थों को किसी भी स्थिति में शुक्ल ध्यान की सिद्धि नहीं हो सकती है।

इसी ग्रंथ में कहा गया है कि मिथ्यादृष्टियों को भी ध्यान की सिद्धि कदापि नहीं हो सकती है। यथा—

दुर्दशामपि न ध्यान—सिद्धि: स्वप्नेऽपि जायते।
गृण्हतां दृष्टिवैकल्याद् वस्तुजातं यदृच्छया।।१८।।

क्रमशः...

देश के इतिहास में स्वर्णिम दिवस


राष्ट्रपति भवन में सर्वोच्च जैन साध्वी का मंगल उद्बोधन

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भारत गणतंत्र के राष्ट्रपति माननीय श्री रामनाथ जी कोविंद के व्यक्तिगत आमंत्रण पर जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी भरतगौरव गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का मंगल आगमन बड़े आत्मीय एवं विशिष्ट आदर सम्मान के साथ दिनांक 14 नवम्बर 2021 को प्रातः 9.30 बजे राष्ट्रपति भवन में हुआ। सर्वप्रथम संघ सहित पधारीं पूज्य माताजी का साउथ कोर्ट के प्रवेश द्वार पर राष्ट्रपति जी के सचिव महोदय ने अभिवंदन किया। पुनः गाइड के माध्यम से 350 एकड़ में विकसित राष्ट्रपति भवन के विभिन्न विशेष स्थानों पर समस्त संघ को भ्रमण कराया गया, जिसमें अशोका हॉल, दरबार हॉल, मुग़ल गार्डन आदि स्थान शामिल रहे।

क्रमशः...

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महासती चन्दना


महासती चन्दना

सिन्धु देश की वैशाली नगरी में राजा चेटक राज्य करते थे। वे जिनेन्द्रदेव के परम भक्त थे, उनकी रानी का नाम सुभद्रा था। इन दम्पत्ति के दस पुत्र हुए जो कि धनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, सुदत्त, सुकम्भोज, अवंâपन, पतंगक, प्रभंजन और प्रभास नाम से प्रसिद्ध हुए तथा उत्तम क्षमा आदि दस धर्मों के समान जान पड़ते थे। इन पुत्रों के सिवाय सात ऋद्धियों के समान सात पुत्रियाँ भी थीं, जिनमें सबसे बड़ी प्रियकारिणी थी, उससे छोटी मृगावती, उससे छोटी सुप्रभा, उससे छोटी प्रभावती, उससे छोटी चेलना, उससे छोटी ज्येष्ठा और सबसे छोटी चन्दना थी।

विदेहदेश के कुण्डलपुर नगर में नाथवंश के शिरोमणि एवं तीनों सिद्धियों से सम्पन्न राजा सिद्धार्थ राज्य करते थे। पुण्य के प्रताप से प्रियकारिणी उनकी पत्नी हुई थीं। वत्सदेश के कौशाम्बी नगर में चन्द्रवंशी राजा शतानीक रहते थे, मृगावती नाम की दूसरी पुत्री इन्हें ब्याही गई। दशार्ण देश के हेमकच्छ नगर के स्वामी राजा दशरथ थे, ये सूर्यवंश के तिलक थे। सूर्य की निर्मल प्रभा के समान सुप्रभा इनकी रानी हुई थीं। कच्छदेश के रोरुक नामक नगरी में उदयन नाम का प्रतापशाली राजा था उसको प्रभावती नाम की चौथी पुत्री विवाही गई थी। अच्छी तरह शीलव्रत के पालन करने से उसका दूसरा नाम शीलवती भी प्रसिद्ध हो गया था। गांधार देश के महीपुर नगर में राजा सत्यक रहता था, उसने राजा चेटक से उसकी ज्येष्ठा नाम की पुत्री की याचना की परन्तु राजा ने नहीं दी। इससे उसने कुपित होकर रणांगण में युद्ध किया परन्तु युद्ध में वह हार गया। जिससे मान भंग होने से उसने दमवर मुनिवर के समीप जाकर जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली।

तदनन्तर राजा चेटक ने स्नेह के कारण सदा देखने के लिये पट्टक पर अपनी सातों पुत्रियों के उत्तम चित्र बनवाये। राजा चेटक देव की पूजा के समय जिनप्रतिमा के समीप ही अपनी पुत्रियों का चित्रपट पैâलाकर सदा पूजा किया करते थे। किसी समय राजा चेटक अपनी सेना के साथ मगध देश के राजगृह नगर में गये। वहाँ उन्होंने नगर के बाह्य उपवन में डेरा डाला। स्नान करने के बाद उन्होंने पहले जिनप्रतिमाओं की पूजा की और उसके बाद समीप में रखे हुए चित्रपट की पूजा की। यह देखकर राजा श्रेणिक ने समीपवर्ती लोगों से पूछा कि यह क्या है ? तब उन लोगों ने कहा कि राजन्! ये राजा की सातों पुत्रियों के चित्रपट हैं। इनमें से चार पुत्रियाँ तो विवाहित हो चुकी हैं परन्तु तीन अविवाहित हैं, उन्हें ये अभी नहीं दे रहा है। इन तीन कन्याओं में दो तो यौवनवती हैं और छोटी अभी बालिका है।

क्रमशः...

सम्यग्ज्ञान पत्रिका



समाचार


पूज्य माताजी का मंगल विहार
सजल नेत्रों के साथ दिल्ली से हस्तिनापुर के लिए हुआ मंगल विहार-
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भारतगौरव दिव्यशक्ति गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का संघ सहित आज 25 नवम्बर को मध्याह्न 2.45 बजे पर दिल्ली के भगवान भरत ज्ञानस्थली तीर्थ-कनॉटप्लेस से हस्तिनापुर के लिए मंगल विहार हुआ।

सजल नेत्रों के साथ जहाँ पूज्य माताजी व प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी आदि संघ ने 31 फ़ीट उत्तुंग भगवान भरत से विदा ली वहीं उपस्थित अनेकों भक्तों ने द्रवित नेत्रों के साथ अपनी गुरुमाँ को भी विहार करवाकर उनसे विदाई ली।

इतना ही नहीं इस अवसर पर सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकान्तसागर जी महाराज ने भी अपने सभी साधुओं व शिष्यों के साथ पूज्य माताजी के मंगल विहार व अच्छे स्वास्थ की शुभेच्छा करते हुए अश्रु भरे नयनों से पूज्य माताजी व संघ को आशीर्वाद देकर सभी को राजा बाज़ार जैन मंदिर तक प्रस्थान कराया।

एक तरफ़ उत्साह एवं बाजे-गाजे के साथ हाथों में केशरिया ध्वज थामें श्रीमती सुजाता शाह पुणे ने संघपती का दायित्व निभाया तो दूसरी तरफ़ उदास मन के साथ दिल्ली के भक्तों ने पूज्य माताजी को अपने राजधानी शहर से विहार कराते हुए उन्हें प्रथम पड़ाव लालमंदिर, चाँदनी चौक तक छोड़ा।

बंधुओं अब विहार क्रम में कल 26 नवम्बर को मध्याह्न लगभग 2 बजे लालमंदिर से पूज्य माताजी संघ का मंगल विहार कैलाशनगर गली न. 2 स्थित दिगम्बर जैन मंदिर के लिए होगा। 27 व 28 नवम्बर को यहीं आहारचर्या व धर्मसभा आदि कार्यक्रम होंगे पुनः 28 नवम्बर को मध्याह्न ऋषभविहार के लिए प्रस्थान होगा। आगे की सूचना आपको क्रमशः प्रदान की जाएगी। धन्यवाद!

-डॉ. जीवन प्रकाश जैन (संघस्थ) जंबूद्वीप हस्तिनापुर 25-11-2021

तीर्थंकर की दिव्यवाणी


तीर्थंकर की दिव्यवाणी

लेखक—पं. हेमचन्द्र जैन शास्त्री, एम. ए. अजमेर

प्राचीन उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह कहा जाता है कि भगवान् महावीर की दिव्यदेशना राजगृह पर्वत के विपुलाचल (पहाड़ी) पर मिति श्रावण वदी (एकमं) १ के प्रात: प्रारम्भ हुई। यद्यपि भगवान् को वैशाख सुदी १० को केवलज्ञान प्राप्त हो गया था किन्तु सुयोग्य गणधर के बिना वाणी का प्रारम्भ ६६ दिन बाद सौधर्मेन्द्र के प्रयत्न द्वारा हुआ। भगवान समवशरण सभा में विराजमान हुए। सभी देव, मनुष्य, तिर्यंच, नारी, देवीगण निराबाध अपने—अपने स्थान पर सुस्थित हुए। दिव्यध्वनि त्रिकाल या चतुष्काल लगभग २—३० घंटे एक बार में खिरती रही और भव्यजनों के आत्म कल्याणक का साधन बनी। प्रत्येक संज्ञी प्राणी ने इस वाणी को सुनकर अपने सन्देश का निराकरण किया। इस प्रकार भगवान् महावीर द्वारा धर्मचक्र की प्रवृत्ति हुई। वर्तमान जैन वर्ग इन्हीं भगवान् की छत्रछाया में अपना आत्मविकास करने का उद्यम कर रहे हैं।

दिव्य ध्वनि के सम्बन्ध में आगामी आचार्यों ने अनेक प्रकार से विश्लेषण किया है। प्रथम प्रश्न यह है कि भगवान के द्वारा उपदिष्ट तत्त्व ध्वनि के द्वारा होता है, या वाणी के द्वारा। ध्वनि का अभिप्राय है अनक्षर आवाज और वाणी का अर्थ है, अकारादि वर्णों की स्पष्टता और तज्जन्य अर्थ का स्पष्टीकरण। दोनों की प्रक्रियाएं एक दूसरे के विरुद्ध प्रतीत होती हैं। यही कारण हुआ कि तीर्थंकर की दिव्यध्वनि को भिन्न—भिन्न आचार्यों ने अनेक प्रकार विश्लेषण कर प्राणिमात्र को आत्म—कल्याणकारी सिद्ध करने का प्रयत्न किया है।

क्रमशः...

चारित्र का महत्व


चारित्र का महत्व

एकान्तवादी ज्ञान की महिमा कहते हुए उसे ही मोक्षदायक मानते हैं। इस संबंध में स्पष्टीकरण आवश्यक है।मोक्ष का कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक््âचारित्र है। अकेला सम्यग्ज्ञान मोक्षसाधक नहीं है। यह सत्य है कि ज्ञान का मोक्षमार्ग में महत्वपूर्ण स्थान है, किन्तु बिना सम्यकचारित्र के वह ज्ञान निर्वाण नहीं प्रदान करता। वे विचारते हैं—


ज्ञान समान न आन जगत में सुख को कारन,
इह परमामृत जन्म जरा मृत्यु रोग निवारन।।
जे पूरब शिव गए और अब आगे जे हैं,
सो सब महिमा ज्ञान तनी मुनिनाथ कहे हैं।।
कोटि जन्म तप तपै ज्ञान बिन कर्म झरे जे,

ज्ञानी के छिन मांहि त्रिगुप्तितें सहज टरें ते।।

अत: केवल चारित्र का कोई महत्व नहीं है। केवली भगवान के परिपूर्ण केवलज्ञान है, पूर्ण सम्यक्त्व है फिर भी वे बहुत काल तक मुक्त न हो पुण्य विहार करते हुए दिव्यध्वनि द्वारा जगत का कल्याण करते हैं। मोहनीय का क्षय हो जाने से केवली में वीतरागता तथा विज्ञानता का संगम होते हुए भी तत्काल मोक्ष नहीं होता अत: वीतरागता विज्ञानता मोक्ष का साक्षात् कारण नहीं है। मोक्ष का साक्षात् कारण सम्यक्चारित्र है। व्युपरतक्रियानिवृत्ति रूप शुक्लध्यान द्वारा अयोग केवली पंच लघु अक्षर के उच्चारण प्रमाण काल में मोक्ष चले जाते हैं।

क्रमशः..

जैनागम में ज्योतिष


जैनागम में ज्योतिष

- पण्डित श्री गजेन्द्रजैन (ज्योतिषसम्राट् ) फर्रुखनगर, जिला-गुडगांवा (हरियाणा)

जैन मत के अनुसार यह ब्रह्माण्ड अनंत हैं। सदा से हैं, और सदा रहेगा। काल के अनुसार परिवर्तनशील हैं और रहेगा। इसी प्रकार ज्योतिष भी ब्रह्माण्ड की तरह अनादि है। सदा से है और रहेगा । और काल की गणना का मुख्य बिन्दु ही यह ज्योतिष शास्त्र ही है। जैन मान्यता से बीस कोडा कोडी सागर का एक कल्पकाल बताया गया है। इस के दो भाग होते हैं। एक अवसर्पिणी और दूसरा उत्सर्पिणी काल यह दोनों काल क्रमशः से आते जाते रहते हैं । इनके छः भाग होते हैं - क्रमशः - 1. सुषम सुषमा 2.सुषमा 3. सुषम दुःषमा 4. दुःषम सुषमा 5. दुःषम 6. अति दुःषमा । ऐसे अवसर्पिणी काल के 6 भेद हैं। इसी प्रकार इनके उलटे क्रम से उत्सर्पणी काल के छः भेद हैं - 1.अति दुःषमा 2. दुःषमा 3. दुःषम सुषमा4. सुषम दुःषमा 5. सुषमा 6.सुषम सुषमा होते हैं। दस कोडा कोडी सागर प्रमाण का अवसर्पण तथा दस कोडा कोडी की आयु प्रमाण का उत्सर्पणी काल होता है। इन में अवसर्पणी में आयु - बल आदि की हानि और उत्सर्पणी काल में आयु - बलादि की वृद्धि होती है ।

क्रमशः...

श्री महावीर भगवान


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महावीर भगवान का परिचय
‘भगवान महावीर के पूर्वभव’
पुरुरवा भील-

इस जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में सीता नदी के उत्तर किनारे पर ‘पुष्कलावती’ नाम का देश है। उसकी ‘पुण्डरीकिणी’ नगरी में एक ‘मधु’ नाम का वन है। उसमें ‘पुरुरवा’ नाम का एक भीलों का राजा अपनी ‘कालिका’ नाम की स्त्री के साथ रहता था1। किसी दिन दिग्भ्रम के कारण ‘श्री सागरसेन’ नामक मुनिराज को इधर-उधर भ्रमण करते हुये देखकर यह भील उन्हें मारने को उद्यत हुआ उसकी स्त्री ने यह कहकर मना कर दिया कि ‘ये वन के देवता घूम रहे हैं इन्हें मत मारो।’ वह पुरुरवा भील उसी समय मुनि को नमस्कार कर तथा उनके वचन सुनकर शांत हो गया। मुनिराज ने उससे मद्य, मांस और मधु इन तीन मकारों का त्याग करा दिया। मांसाहारी भील भी इन तीनों के त्यागरूप व्रत का जीवनपर्यन्त पालन कर आयु के अंत में मरकर सौधर्म स्वर्ग में एक सागर की आयु को धारण करने वाला देव हो गया कहाँ तो वह हिंसक क्रूर भील पाप करके नरक चला जाता और कहाँ उसे गुरु का समागम मिला कि जिनसे हिंसा का त्याग करके स्वर्ग चला गया।

क्रमश:

आज का दिन - २८ नवम्बर २०२१ (भारतीय समयानुसार)


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दिनाँक २८ नवम्बर २०२१
तिथी- मार्गशीर्ष कृष्ण ९
दिन- रविवार
वीर निर्वाण संवत- २५४८
विक्रम संवत- २०७८

सूर्योदय ०६.५२
सूर्यास्त १७.३७


अथ मार्गशीर्ष मास फल विचार



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परिमार्जित क्ष त्र ज्ञ श्र अः


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