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सप्तऋषि व्रत कथा
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भक्ति आराधना
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सोलहकारण पूजा

सोलहकारण पूजा


-अथ स्थापना-गीता छंद-
दर्शनविशुद्धी आदि सोलह, भावना भवनाशिनी।
जो भावते वे पावते, अति शीघ्र ही शिवकामिनी।।
हम नित्य श्रद्धा भाव से, इनकी करें आराधना।
पूजा करें वसुद्रव्य ले, करके विधीवत थापना।।१।।

ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणभावनासमूह! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणभावनासमूह! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ: ठ: स्थापनं।
ॐ ह्रीं दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणभावनासमूह! अत्र मम सन्निहतो भव भव वषट् सन्निधीकरणं।

क्रमशः...

सप्तऋषि विधान

कार्यशाला

जैन इन्साइक्लोपीडिया : जैन समाज हेतु एक विशिष्ट उपलब्धि!

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दिगंबर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापूर द्वारा संचालित इस बहुआयामी प्रोजेक्ट को देश की सर्वोच्च जैन साध्वी "पूज्य गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी" की प्रेरणा एवं आशीर्वाद तथा योजनाप्रमुख "पूज्य प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका रत्न श्री चंदनामती माताजी" का संपादकत्व प्राप्त होने से इसकी सफलता एवं सार्थकता स्वतः ही स्पष्ट है।
प्रारंभिक रुप में यह ऑनलाइन विश्वकोश विकिपीडिया की तर्ज पर आधारित मीडिया विकी सॉफ्टवेयर में विकसित किया गया एक मात्र अनुपम प्रोजेक्ट है। इस विशाल प्रोजेक्ट से परिचित कराने हेतू पूज्य चंदनामती माताजी की प्रेरणा एवं आदेशानुसार रविवार दिनांक २० मार्च से दि. जैन त्रिलोक शोध संस्थान के तकनीकी "सचिव इंजि. रितेश जैन दोशी, भांडुप मुंबई" द्वारा कार्यशाला का आयोजन हर रविवार को ४:०० से ४:४५ तक भगवान ऋषभदेव झूम चॅनेल पर किया जा रहा है। भारत देश के अनेको प्रांत से युवा वर्ग🧑‍💻🧑‍💻👩‍💻👩‍💻 काफी रुचिपूर्वक इस कार्यशाला में भाग ले रहे है।
तो आइये! वर्तमान विश्व के लिए "जिओ और जीने दो" के सर्वाधिक आवश्यक सिद्धांत को इंटरनेट द्वारा जानने एवं उसके प्रचार-प्रसार हेतु अपनी इंटरनेट से जुड़ी युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित करें, योगदान करें और विज्ञान की इस देन का ज्ञान प्राप्ति हेतु लाभ उठाकर पूण्य प्राप्त करे www.encyclopediaofjainism.com

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सम्यग्ज्ञान पत्रिका


समाचार

-अमृतमयी वर्षायोग-
कनॉट प्लेस, नई दिल्ली

चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी परम्परा के
सप्तम पट्टाचार्य श्री अनेकांतसागर जी महाराज
एवं वर्तमान के समस्त संतों में सर्वप्राचीन दीक्षित
गणिनीप्रमुख आर्यिका शिरोमणी श्री ज्ञानमती माताजी

दोनों संघों के ऐतिहासिक
अमृतमयी वर्षायोग स्थापना की सभा
23 जुलाई 2021, शुक्रवार
आषाढ़ शुक्ला चतुर्दशी को
प्रात: 8 बजे रखी गई है।

सपरिवार पधारकर पुण्य अर्जित करें।

-स्थान-
चक्रवर्ती भगवान भरत ज्ञानस्थली दि. जैन तीर्थक्षेत्र, कनॉट प्लेस,
निकट-शिवाजी स्टेडीयम, नई दिल्ली
अंतर्गत-जैन सभा, नई दिल्ली

-प्रेरणा-
जगद्गुरू पीठाधीश
स्वस्तिश्री रवीन्द्रकीर्ति स्वामीजी

उपन्यास स्वाध्याय प्रतियोगिता
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स्वाध्याय के लिए क्लिक करें...

माननीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह
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जैन समाज की सर्वोच्च साध्वी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी के दर्शनार्थ पधारे रक्षामंत्री माननीय श्री राजनाथ सिंह जी।

आशीर्वाद के अन्य फोटोज देखें

श्री मुनिसुव्रनाथ भगवान
मुनिसुव्रतनाथ भगवान का परिचय
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परिचय

इसी भरतक्षेत्र के अंग देश के चम्पापुर नगर में हरिवर्मा नाम के राजा थे। किसी एक दिन वहाँ के उद्यान में ‘अनन्तवीर्य' नाम के निग्र्रन्थ मुनिराज पधारे। उनकी वन्दना करके राजा ने धर्मोपदेश श्रवण किया और तत्क्षण विरक्त होकर अपने बड़े पुत्र को राज्य देकर अनेक राजाओं के साथ संयम धारण कर लिया। उन्होंने गुरू के समागम से ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और दर्शनविशुद्धि आदि सोलहकारण भावनाओं का चिन्तवन कर तीर्थंकर गोत्र का बंध किया। चिरकाल तक तपश्चरण करते हुए अन्त में समाधिपूर्वक मरण करके प्राणत स्वर्ग में इन्द्र हो गये। वहाँ बीस सागर की आयु थी और उनका साढ़े तीन हाथ का ऊँचा शरीर था।

गर्भ और जन्म

इसी भरतक्षेत्र के मगध देश में राजगृह नाम का नगर है। उसमें हरिवंश- शिरोमणि, काश्यपगोत्रीय, सुमित्र महाराज राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम सोमा था। श्रावण कृष्णा द्वितीया के दिन श्रवण नक्षत्र में रानी ने उन प्राणत इन्द्र को गर्भ में धारण किया, अनुक्रम से नव मास के बाद रानी ने पुत्ररत्न को जन्म दिया। देवों ने भगवान का जन्मोत्सव मनाकर ‘मुनिसुव्रत' नाम प्रकट किया। मल्लिनाथ के बाद चौवन लाख वर्षों के बीत जाने पर इनका जन्म हुआ। इनकी आयु तीस हजार वर्ष एवं ऊँचाई बीस धनुष की थी।

क्रमशः...

श्री कुन्थुनाथ भगवान
कुन्थुनाथ भगवान का परिचय
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परिचय

इसी जम्बूद्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में सीता नदी के दक्षिण तट पर एक वत्स नाम का देश है। उसके सुसीमा नगर में सिंहरथ राजा राज्य करता था। वह राजा किसी समय उल्कापात देखकर विरक्त हो गया और विरक्त होकर संयम धारण कर लिया। उसने ग्यारह अंगों का ज्ञान प्राप्त किया तथा सोलहकारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया। अन्त में समाधिमरण करके सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हो गये।

गर्भ और जन्म

कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में कौरववंशी काश्यप गोत्रीय महाराज सूरसेन राज्य करते थे। उनकी पट्टरानी का नाम श्रीकान्ता था। उस पतिव्रता देवी ने देवों के द्वारा की हुई रत्नवृष्टि आदि पूजा प्राप्त की थी। श्रावण कृष्ण दशमी के दिन रानी ने सर्वार्थसिद्धि के अहमिन्द्र को गर्भ में धारण किया। उस समय इन्द्रों ने आकर भगवान का गर्भमहोत्सव मनाया और माता की पूजा करके स्वस्थान को चले गये। क्रम से नवमास व्यतीत हो जाने पर वैशाख शुक्ला प्रतिपदा के दिन पुत्ररत्न को जन्म दिया। उसी समय इन्द्रादि देवगण आये और बालक को सुमेरू पर्वत पर ले जाकर महामहिम जन्माभिषेक महोत्सव करके अलंकारों से अलंकृत किया एवं बालक का नाम ‘कुन्थुनाथ' रखा। वापस लाकर माता-पिता को सौंपकर देवगण स्वस्थान को चले गये। पंचानवे हजार वर्ष की उनकी आयु थी। पैंतीस धनुष ऊँचा शरीर था और तपाए हुए स्वर्ण के समान शरीर की कान्ति थी। तेईस हजार सात सौ पचास वर्ष कुमारकाल के बीत जाने पर उन्हें राज्य प्राप्त हुआ और इतना ही काल बीत जाने पर उन्हें वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन चक्रवर्ती की लक्ष्मी मिली। इस प्रकार वे बाधारहित, निरन्तर दस प्रकार के भोगों का उपभोग करते थे। सारा वैभव शान्तिनाथ के समान ही था। किसी समय भगवान षडंग सेना से संयुक्त होकर क्रीड़ा से वहाँ वापस लौट रहे थे कि मार्ग में उन्होंने किसी मुनि को आतपयोग से स्थित देखा। देखते ही मंत्री के प्रति तर्जनी अंगुली से इशारा किया कि देखो-देखो! मंत्री उन मुनिराज को देखकर नतमस्तक हो गया और पूछने लगा कि हे देव! इस तरह कठिन तप कर ये क्या फल प्राप्त करेंगे ? चक्रवर्ती कुन्थुनाथ हँसकर कहने लगे कि ये मुनि या तो इसी भव से कर्म काटकर निर्वाण प्राप्त करेंगे या तप के प्रभाव से शाश्वत धाम प्राप्त करेंगे। जो परिग्रह का त्याग नहीं करते, वे संसार में ही परिभ्रमण करते रहते हैं। इत्यादि रूप से भगवान ने मंत्री को मोक्ष तथा संसार के कारणों का निरूपण किया। चक्रवर्ती पद के साम्राज्य का उपभोग करते हुए भगवान के तेईस हजार सात सौ पचास वर्ष व्यतीत हो गये।

क्रमश:

आज का दिन - २६ जुलाई २०२१ (भारतीय समयानुसार)
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दिनाँक २६ जुलाई २०२१
तिथी- श्रावण कृष्ण ३
दिन- सोमवार
वीर निर्वाण संवत- २५४७
विक्रम संवत- २०७८

सूर्योदय ०५.५९
सूर्यास्त १९.०७


अथ श्रावण मास फल विचार



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०-९ अं
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