"राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा" के अवतरणों में अंतर

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(राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा)
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==<center><font color=majenta>'''राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा'''</font></center>==
 
==<center><font color=majenta>'''राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा'''</font></center>==
 
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 +
-दोहा-
 +
श्री मुनिसुव्रत पद कमल,शत शत करूं प्रणाम |
 +
जिनशासन के सूर्य वे,करें स्व पर कल्याण ||१||
 +
त्रैलोक्याधिपती बने, कर्मशत्रु को जीत |
 +
चालीसा उनका कहूँ , पाऊं आत्म नवनीत ||२||
 +
-चौपाई –
 +
जय जय श्री मुनिसुव्रत स्वामी,तीन लोक में हो तुम नामी ||१||
 +
नृप सुमित्र के गृह तुम जन्में , सोमावति माता आनंदें||२||
 +
श्याम वर्ण की मूरत न्यारी,जन जन को लगती है प्यारी ||३||
 +
वदि वैशाख दुवादश जन्में,स्वर्ग से इन्द्र सपरिकर पहुचें ||४||
 +
राजगृही में मंगल छाया, सबने अति आनंद मनाया ||५||
 +
लिया इन्द्र ने गोद में प्रभु को, पांडुशिला पर पहुंचे फिर वो ||६||
 +
एक हजार आठ कलशों से ,न्ह्वन करें सब प्रमुदित मन से ||७||
 +
वदि वैशाख सुदशमी आई, जातिस्मृति से विरक्ति छाई ||८||
 +
छोड़ दिया त्रणवत सब वैभव, दीक्षा लेने चल दिए वन को ||९||
 +
घोर तपश्चर्या को करते, केवलज्ञान प्रगट हुआ उनके ||१०||
 +
चार घातिया कर्म विनाशा , लोकालोक सकल परकाशा ||११||
 +
बन गए समवशरण के देवा ,सुर नर मुनि करते तुम सेवा ||१२||
 +
दिव्यध्वनि का पान कर लिया, सबने निज उत्थान कर लिया ||१३||
 +
अस्सी हाथ प्रमाण तनू है , कच्छप चिन्ह तुम्हारा प्रभु है ||१४||
 +
श्रीविहार कर पहुंचे जिनवर, श्री सम्मेदशिखर पर्वत पर ||१५||
 +
मुक्तिरमा का वरण कर लिया, सिद्धगती को ग्रहण कर लिया ||१६||
 +
अखिल अमंगल हरने वाले , भवि जीवों के तुम रखवारे ||१७||
 +
भक्ति आपकी जो भी करता , पाप ताप भय संकट हरता ||१८||
 +
हे शनिग्रह के स्वामी देवा , प्रभु तुम हो देवन के देवा ||१९||
 +
मेरे सारे कष्ट मिटा दो, मेरी बिगड़ी आज बना दो ||२०||
 +
नवग्रह जग में माने जाते , प्राणी को सुख दुःख दिलवाते ||२१||
 +
क्रूर कहा उनमें से जिसको, शनिग्रह ही कहलाया है वह ||२२||
 +
इसके चक्र में फंसकर प्राणी, बनता मूढ़ और अज्ञानी ||२३||
 +
कोई ज्योतिष के ढिग जाता, कोई मिथ्या में भरमाता ||२४||
 +
कहें शनी की साढ़े साती, और जलाते दीपक बाती ||२५||
 +
किन्तु नहीं हो उससे मुक्ती, प्राणी को नहिं सूझे युक्ती ||२६||
 +
इस ग्रह का यदि चक्र सतावे, पथ से जीवों को भटकावे ||२७||
 +
कलह कष्ट की घड़ियाँ आतीं, मन की व्यथा बढ़ाती जातीं||२८||
 +
किन्तु जपे जो नाम तुम्हारा, ग्रह के चक्र से हो छुटकारा ||२९||
 +
रोग शोक भय व्याधी मिटती, आत्मज्ञान की कलिका खिलती ||३०||
 +
करें शुद्ध मन से आराधन, क्षण हो जाता पाप शमन सब ||३१||
 +
अशुभ कर्म शुभ में परिणत हों, प्राणी धर्म कर्म में रत हों ||३२||
 +
नाम मन्त्र की जपना माला, सुख समृद्धि दिलाने वाला ||३३||
 +
कृपादृष्टि जो प्रभु की पावे, धन आरोग्य आदि मिल जावे ||३४||
 +
चमत्कार है तेरा न्यारा, भक्तों को मिलता सुखकारा ||३५||
 +
भवसागर बिच नाव हमारी, पार करो यह विरद हमारी ||३६||
 +
शनिग्रह की बाधाएं हर लो, शांतिपूर्ण मम जीवन कर दो ||३७||
 +
संकटमोचन तुम हो स्वामी, हे करुणाकर अंतर्यामी ||३८||
 +
तव भक्ती का फल यह चाहूँ, अंत समय तक तव गुण गाऊँ ||३९||
 +
भव-भव में बस तुमको पाऊँ, आत्मरमण कर शिवपद पाऊँ ||४०||
 +
-दोहा-
 +
चालीस दिन तक जो पढ़े, नित चालीसहिं बार |
 +
दीप धूप विधिवत जला, मिले सुगुण भण्डार||१||
 +
मुनिसुव्रत भगवान की,’इंदु’ करे जो जाप्य |
 +
शनिग्रह पीड़ा दूर हो, हरें सकल संताप ||२||
 +
 +
 +
 +
 +
-दोहा-
 +
नेमिनाथ भगवान को, वंदन बारम्बार |
 +
उनके वचनामृत सभी, भविजन को सुखकार ||१||
 +
स्वात्मनिधी को प्राप्त कर,किया आत्मकल्याण |
 +
चालीसा के पाठ से,जिनवर का गुणगान ||२||
 +
-चौपाई –
 +
जय जय जय श्री नेमि जिनेश्वर, कहलाए प्रभु तुम परमेश्वर ||१||
 +
गर्भ में माता के जब आए, सोलह स्वप्न उन्हें दिखलाए ||२||
 +
धनकुबेर करता है वृष्टी, पन्द्रह महिने तक नित होती ||३||
 +
श्रावण शुक्ला छठ तिथि पावन,धन्य शिवादेवी का आँगन ||४||
 +
राजा समुद्रविजय हरषाए , शौरीपुर में खुशियाँ छाएं ||५||
 +
तीन लोक में आनंद छाया, स्वर्ग से इन्द्र सपरिकर आया ||६||
 +
मेरु सुदर्शन पर ले जाकर, कलशे खूब ढुराए प्रभु पर ||७||
 +
नीलकमल सम सुन्दर काया, बालपने से यौवन आया ||८||
 +
राजुल के संग ब्याह करन को, चले प्रभू जब जूनागढ़ को ||९||
 +
पशुओं की चीत्कार सुनी जब, तत्क्षण हुए विरागी जिनवर ||१०||
 +
श्रावण सुदि छठ की शुभ तिथि में, सहस्राम्र वन में प्रभु पहुचे||११||
 +
नमः सिद्ध कह दीक्षा ले ली, आत्मरमण की शिक्षा दे दी ||१२||
 +
बाल ब्रम्हचारी वे जिनवर, वीतराग सर्वज्ञ हितंकर ||१३||
 +
आश्विन सुदि एकम की तिथि में, ऊर्जयंतगिरि पर जा तिष्ठे ||१४||
 +
प्रभु को केवलज्ञान हो गया, आत्मा का उत्थान हो गया ||१५||
 +
धनद ने समवशरण रचवाया, दिव्यध्वनि सुन् जग हरषाया ||१६||
 +
राजुल ने जब सुनी ये घटना, फ़ेंक दिया श्रृंगार फिर पुनः ||१७||
 +
बहुत दुखी हो रोती जाती, ऊर्जयंतगिरि चढ़ती जाती ||१८||
 +
उपदेशामृत पान कर लिया, संयम का शुभ मार्ग लख लिया ||१९||
 +
दीक्षा ले गणिनी कहलाईं, सच्ची प्रभु से प्रीति लगाई ||२०||
 +
समवशरण में कमलासन पर, चतुरंगुल भी रहें प्रभु अधर ||२१||
 +
चारों दिश में मुख है दिखता, तभी जगत है ब्रम्हा कहता ||२२||
 +
समवशरण का वैभव न्यारा, ग्रंथों में है वर्णन सारा ||२३||
 +
ऊर्जयंतगिरि पर्वत से ही, मोक्ष पधारे त्रिभुवनपति जी ||२४||
 +
लोकशिखर पर आन विराजे, नेमिनाथ जिनराज हमारे ||२५||
 +
वे तो वीतराग जिनदेवा, किन्तु करे जो भक्ती सेवा ||२६||
 +
उनके मनवांछित फल जाते, रोग,शोक,भय,व्याधि भगाते ||२७||
 +
आतमज्ञान उन्हें मिल जाता,भवि निज पर कल्याण कराता ||२८||
 +
राहूग्रह के स्वामी तुम हो, मेरे सभी अमंगल हर लो ||२९||
 +
ग्रह का चक्र अनादिकाल से, प्राणी को भटकाता जग में ||३०||
 +
जन्मकुंडली में यदि यह ग्रह, अशुभ जगह पर हो जाते हैं ||३१||
 +
प्राणी को पीड़ा देते हैं, जीव दुखी तब ही होते हैं ||३२||
 +
अगर उच्च स्थान पे होते, सुख,समृद्धि सभी दे देते ||३३||
 +
स्वस्थ शरीर मिले धन सम्पति,और साथ में यशकीर्ती भी ||३४||
 +
राहू ग्रह की बढ़े असाता, तन में है बहु रोग सताता ||३५||
 +
धर्म में रुचि नहिं बढ़ पाती है,मन में शांति न हो पाती है ||३६||
 +
नेमीप्रभु की जपते माला, वे पाएंगे सौख्य निराला ||३७||
 +
प्रभु भक्ती से पाप कटेंगे,ग्रह भी उच्च और शुभ होंगे ||३८||
 +
सांसारिक दुःख से घबराया, अतः आपकी शरण में आया ||३९||
 +
परम क्रपालु दया अब कर दो, राहू ग्रह की बाधा हर लो||४०||
 +
-शम्भू छंद –
 +
श्री नेमिनाथ का चालीसा, जो चालीस दिन तक पढ़ते हैं |
 +
फिर साथ-साथ विधि के संग में,उन नाम की माला जपते हैं ||
 +
विघ्नों का शीघ्र शमन होकर, सब व्याधि व्यथाएँ नश जातीं |
 +
सुख सम्पति संतति बढ़े सदा,आत्मा में परम शांति आती ||१||
 +
-दोहा-
 +
चालीसा विधिवत पढ़े , चालिस चालिस बार |
 +
राहू ग्रह के कष्ट से,वो हो जाता पार ||१||
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१९:२६, २४ जनवरी २०२० का अवतरण

राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा


-दोहा-
श्री मुनिसुव्रत पद कमल,शत शत करूं प्रणाम |
जिनशासन के सूर्य वे,करें स्व पर कल्याण ||१||
त्रैलोक्याधिपती बने, कर्मशत्रु को जीत |
चालीसा उनका कहूँ , पाऊं आत्म नवनीत ||२||
-चौपाई –
जय जय श्री मुनिसुव्रत स्वामी,तीन लोक में हो तुम नामी ||१||
नृप सुमित्र के गृह तुम जन्में , सोमावति माता आनंदें||२||
श्याम वर्ण की मूरत न्यारी,जन जन को लगती है प्यारी ||३||
वदि वैशाख दुवादश जन्में,स्वर्ग से इन्द्र सपरिकर पहुचें ||४||
राजगृही में मंगल छाया, सबने अति आनंद मनाया ||५||
लिया इन्द्र ने गोद में प्रभु को, पांडुशिला पर पहुंचे फिर वो ||६||
एक हजार आठ कलशों से ,न्ह्वन करें सब प्रमुदित मन से ||७||
वदि वैशाख सुदशमी आई, जातिस्मृति से विरक्ति छाई ||८||
छोड़ दिया त्रणवत सब वैभव, दीक्षा लेने चल दिए वन को ||९||
घोर तपश्चर्या को करते, केवलज्ञान प्रगट हुआ उनके ||१०||
चार घातिया कर्म विनाशा , लोकालोक सकल परकाशा ||११||
बन गए समवशरण के देवा ,सुर नर मुनि करते तुम सेवा ||१२||
दिव्यध्वनि का पान कर लिया, सबने निज उत्थान कर लिया ||१३||
अस्सी हाथ प्रमाण तनू है , कच्छप चिन्ह तुम्हारा प्रभु है ||१४||
श्रीविहार कर पहुंचे जिनवर, श्री सम्मेदशिखर पर्वत पर ||१५||
मुक्तिरमा का वरण कर लिया, सिद्धगती को ग्रहण कर लिया ||१६||
अखिल अमंगल हरने वाले , भवि जीवों के तुम रखवारे ||१७||
भक्ति आपकी जो भी करता , पाप ताप भय संकट हरता ||१८||
हे शनिग्रह के स्वामी देवा , प्रभु तुम हो देवन के देवा ||१९||
मेरे सारे कष्ट मिटा दो, मेरी बिगड़ी आज बना दो ||२०||
नवग्रह जग में माने जाते , प्राणी को सुख दुःख दिलवाते ||२१||
क्रूर कहा उनमें से जिसको, शनिग्रह ही कहलाया है वह ||२२||
इसके चक्र में फंसकर प्राणी, बनता मूढ़ और अज्ञानी ||२३||
कोई ज्योतिष के ढिग जाता, कोई मिथ्या में भरमाता ||२४||
कहें शनी की साढ़े साती, और जलाते दीपक बाती ||२५||
किन्तु नहीं हो उससे मुक्ती, प्राणी को नहिं सूझे युक्ती ||२६||
इस ग्रह का यदि चक्र सतावे, पथ से जीवों को भटकावे ||२७||
कलह कष्ट की घड़ियाँ आतीं, मन की व्यथा बढ़ाती जातीं||२८||
किन्तु जपे जो नाम तुम्हारा, ग्रह के चक्र से हो छुटकारा ||२९||
रोग शोक भय व्याधी मिटती, आत्मज्ञान की कलिका खिलती ||३०||
करें शुद्ध मन से आराधन, क्षण हो जाता पाप शमन सब ||३१||
अशुभ कर्म शुभ में परिणत हों, प्राणी धर्म कर्म में रत हों ||३२||
नाम मन्त्र की जपना माला, सुख समृद्धि दिलाने वाला ||३३||
कृपादृष्टि जो प्रभु की पावे, धन आरोग्य आदि मिल जावे ||३४||
चमत्कार है तेरा न्यारा, भक्तों को मिलता सुखकारा ||३५||
भवसागर बिच नाव हमारी, पार करो यह विरद हमारी ||३६||
शनिग्रह की बाधाएं हर लो, शांतिपूर्ण मम जीवन कर दो ||३७||
संकटमोचन तुम हो स्वामी, हे करुणाकर अंतर्यामी ||३८||
तव भक्ती का फल यह चाहूँ, अंत समय तक तव गुण गाऊँ ||३९||
भव-भव में बस तुमको पाऊँ, आत्मरमण कर शिवपद पाऊँ ||४०||
-दोहा-
चालीस दिन तक जो पढ़े, नित चालीसहिं बार |
दीप धूप विधिवत जला, मिले सुगुण भण्डार||१||
मुनिसुव्रत भगवान की,’इंदु’ करे जो जाप्य |
शनिग्रह पीड़ा दूर हो, हरें सकल संताप ||२||


 

 -दोहा-
नेमिनाथ भगवान को, वंदन बारम्बार |
उनके वचनामृत सभी, भविजन को सुखकार ||१||
स्वात्मनिधी को प्राप्त कर,किया आत्मकल्याण |
चालीसा के पाठ से,जिनवर का गुणगान ||२||
-चौपाई –
जय जय जय श्री नेमि जिनेश्वर, कहलाए प्रभु तुम परमेश्वर ||१||
गर्भ में माता के जब आए, सोलह स्वप्न उन्हें दिखलाए ||२||
धनकुबेर करता है वृष्टी, पन्द्रह महिने तक नित होती ||३||
श्रावण शुक्ला छठ तिथि पावन,धन्य शिवादेवी का आँगन ||४||
राजा समुद्रविजय हरषाए , शौरीपुर में खुशियाँ छाएं ||५||
तीन लोक में आनंद छाया, स्वर्ग से इन्द्र सपरिकर आया ||६||
मेरु सुदर्शन पर ले जाकर, कलशे खूब ढुराए प्रभु पर ||७||
नीलकमल सम सुन्दर काया, बालपने से यौवन आया ||८||
राजुल के संग ब्याह करन को, चले प्रभू जब जूनागढ़ को ||९||
पशुओं की चीत्कार सुनी जब, तत्क्षण हुए विरागी जिनवर ||१०||
श्रावण सुदि छठ की शुभ तिथि में, सहस्राम्र वन में प्रभु पहुचे||११||
नमः सिद्ध कह दीक्षा ले ली, आत्मरमण की शिक्षा दे दी ||१२||
बाल ब्रम्हचारी वे जिनवर, वीतराग सर्वज्ञ हितंकर ||१३||
आश्विन सुदि एकम की तिथि में, ऊर्जयंतगिरि पर जा तिष्ठे ||१४||
प्रभु को केवलज्ञान हो गया, आत्मा का उत्थान हो गया ||१५||
धनद ने समवशरण रचवाया, दिव्यध्वनि सुन् जग हरषाया ||१६||
राजुल ने जब सुनी ये घटना, फ़ेंक दिया श्रृंगार फिर पुनः ||१७||
बहुत दुखी हो रोती जाती, ऊर्जयंतगिरि चढ़ती जाती ||१८||
उपदेशामृत पान कर लिया, संयम का शुभ मार्ग लख लिया ||१९||
दीक्षा ले गणिनी कहलाईं, सच्ची प्रभु से प्रीति लगाई ||२०||
समवशरण में कमलासन पर, चतुरंगुल भी रहें प्रभु अधर ||२१||
चारों दिश में मुख है दिखता, तभी जगत है ब्रम्हा कहता ||२२||
समवशरण का वैभव न्यारा, ग्रंथों में है वर्णन सारा ||२३||
ऊर्जयंतगिरि पर्वत से ही, मोक्ष पधारे त्रिभुवनपति जी ||२४||
लोकशिखर पर आन विराजे, नेमिनाथ जिनराज हमारे ||२५||
वे तो वीतराग जिनदेवा, किन्तु करे जो भक्ती सेवा ||२६||
उनके मनवांछित फल जाते, रोग,शोक,भय,व्याधि भगाते ||२७||
आतमज्ञान उन्हें मिल जाता,भवि निज पर कल्याण कराता ||२८||
राहूग्रह के स्वामी तुम हो, मेरे सभी अमंगल हर लो ||२९||
ग्रह का चक्र अनादिकाल से, प्राणी को भटकाता जग में ||३०||
जन्मकुंडली में यदि यह ग्रह, अशुभ जगह पर हो जाते हैं ||३१||
प्राणी को पीड़ा देते हैं, जीव दुखी तब ही होते हैं ||३२||
अगर उच्च स्थान पे होते, सुख,समृद्धि सभी दे देते ||३३||
स्वस्थ शरीर मिले धन सम्पति,और साथ में यशकीर्ती भी ||३४||
राहू ग्रह की बढ़े असाता, तन में है बहु रोग सताता ||३५||
धर्म में रुचि नहिं बढ़ पाती है,मन में शांति न हो पाती है ||३६||
नेमीप्रभु की जपते माला, वे पाएंगे सौख्य निराला ||३७||
प्रभु भक्ती से पाप कटेंगे,ग्रह भी उच्च और शुभ होंगे ||३८||
सांसारिक दुःख से घबराया, अतः आपकी शरण में आया ||३९||
परम क्रपालु दया अब कर दो, राहू ग्रह की बाधा हर लो||४०||
-शम्भू छंद –
श्री नेमिनाथ का चालीसा, जो चालीस दिन तक पढ़ते हैं |
फिर साथ-साथ विधि के संग में,उन नाम की माला जपते हैं ||
विघ्नों का शीघ्र शमन होकर, सब व्याधि व्यथाएँ नश जातीं |
सुख सम्पति संतति बढ़े सदा,आत्मा में परम शांति आती ||१||
-दोहा-
चालीसा विधिवत पढ़े , चालिस चालिस बार |
राहू ग्रह के कष्ट से,वो हो जाता पार ||१||
 


  
 



  





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