"राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा" के अवतरणों में अंतर

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('श्रेणी:जिनेन्द्र भक्ति ==<center><font color=majenta>'''राहुग्रहारि...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
(राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा)
 
(२ सदस्यों द्वारा किये गये बीच के ७ अवतरण नहीं दर्शाए गए)
पंक्ति १: पंक्ति १:
[[श्रेणी:जिनेन्द्र भक्ति]]
 
 
==<center><font color=majenta>'''राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा'''</font></center>==
 
==<center><font color=majenta>'''राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा'''</font></center>==
 +
<div class="side-border16">
 +
<poem><center>
 +
-दोहा-
 +
[[नेमिनाथ]] [[भगवान]] को, वंदन बारम्बार |
 +
उनके वचनामृत सभी, भविजन को सुखकार ||१||
 +
[[स्वात्मनिधी]] को प्राप्त कर,किया [[आत्मकल्याण]] |
 +
चालीसा के पाठ से,[[जिनवर]] का गुणगान ||२||
 +
-चौपाई –
 +
जय जय जय श्री नेमि [[जिनेश्वर]], कहलाए प्रभु तुम परमेश्वर ||१||
 +
गर्भ में माता के जब आए, [[सोलह स्वप्न]] उन्हें दिखलाए ||२||
 +
[[धनकुबेर]] करता है [[वृष्टी]], पन्द्रह महिने तक नित होती ||३||
 +
श्रावण शुक्ला छठ तिथि पावन,धन्य शिवादेवी का आँगन ||४||
 +
राजा समुद्रविजय हरषाए , [[शौरीपुर]] में खुशियाँ छाएं ||५||
 +
तीन लोक में आनंद छाया, [[स्वर्ग]] से [[इन्द्र]] सपरिकर आया ||६||
 +
[[मेरु]] [[सुदर्शन]] पर ले जाकर, कलशे खूब ढुराए प्रभु पर ||७||
 +
नीलकमल सम सुन्दर काया, बालपने से यौवन आया ||८||
 +
राजुल के संग ब्याह करन को, चले प्रभू जब जूनागढ़ को ||९||
 +
पशुओं की चीत्कार सुनी जब, तत्क्षण हुए [[विरागी]] [[जिनवर]] ||१०||
 +
श्रावण सुदि छठ की शुभ तिथि में, सहस्राम्र वन में प्रभु पहुचे||११||
 +
नमः सिद्ध कह [[दीक्षा]] ले ली, [[आत्मरमण]] की शिक्षा दे दी ||१२||
 +
[[बाल ब्रम्हचारी]] वे [[जिनवर]], [[वीतराग]] [[सर्वज्ञ]] [[हितंकर]] ||१३||
 +
आश्विन सुदि एकम की तिथि में, [[ऊर्जयंतगिरि]] पर जा तिष्ठे ||१४||
 +
प्रभु को [[केवलज्ञान]] हो गया, [[आत्मा]] का उत्थान हो गया ||१५||
 +
[[धनद]] ने [[समवशरण]] रचवाया, [[दिव्यध्वनि]] सुन् जग हरषाया ||१६||
 +
राजुल ने जब सुनी ये घटना, फ़ेंक दिया श्रृंगार फिर पुनः ||१७||
 +
बहुत दुखी हो रोती जाती, [[ऊर्जयंतगिरि]] चढ़ती जाती ||१८||
 +
[[उपदेशामृत]] पान कर लिया, [[संयम]] का शुभ मार्ग लख लिया ||१९||
 +
[[दीक्षा]] ले [[गणिनी]] कहलाईं, सच्ची प्रभु से प्रीति लगाई ||२०||
 +
[[समवशरण]] में [[कमलासन]] पर, [[चतुरंगुल]] भी रहें प्रभु अधर ||२१||
 +
चारों दिश में मुख है दिखता, तभी जगत है [[ब्रम्हा]] कहता ||२२||
 +
[[समवशरण]] का [[वैभव]] न्यारा, [[ग्रंथों]] में है वर्णन सारा ||२३||
 +
[[ऊर्जयंतगिरि]] [[पर्वत]] से ही, [[मोक्ष]] पधारे [[त्रिभुवनपति]] जी ||२४||
 +
[[लोकशिखर]] पर आन विराजे, [[नेमिनाथ]] [[जिनराज]] हमारे ||२५||
 +
वे तो [[वीतराग]] जिनदेवा, किन्तु करे जो भक्ती सेवा ||२६||
 +
उनके मनवांछित फल जाते, रोग,शोक,भय,व्याधि भगाते ||२७||
 +
[[आतमज्ञान]] उन्हें मिल जाता,भवि निज पर कल्याण कराता ||२८||
 +
[[राहूग्रह]] के स्वामी तुम हो, मेरे सभी अमंगल हर लो ||२९||
 +
[[ग्रह]] का चक्र [[अनादिकाल]] से, प्राणी को भटकाता जग में ||३०||
 +
[[जन्मकुंडली]] में यदि यह [[ग्रह]], अशुभ जगह पर हो जाते हैं ||३१||
 +
प्राणी को पीड़ा देते हैं, जीव दुखी तब ही होते हैं ||३२||
 +
अगर उच्च स्थान पे होते, सुख,समृद्धि सभी दे देते ||३३||
 +
स्वस्थ शरीर मिले धन सम्पति,और साथ में यशकीर्ती भी ||३४||
 +
[[राहू ग्रह]] की बढ़े असाता, तन में है बहु रोग सताता ||३५||
 +
धर्म में रुचि नहिं बढ़ पाती है,मन में शांति न हो पाती है ||३६||
 +
[[नेमीप्रभु]] की जपते माला, वे पाएंगे सौख्य निराला ||३७||
 +
प्रभु भक्ती से पाप कटेंगे,ग्रह भी उच्च और शुभ होंगे ||३८||
 +
सांसारिक दुःख से घबराया, अतः आपकी शरण में आया ||३९||
 +
परम क्रपालु दया अब कर दो,[[ राहू ग्रह]] की बाधा हर लो||४०||
 +
-शम्भू छंद –
 +
श्री [[नेमिनाथ]] का चालीसा, जो चालीस दिन तक पढ़ते हैं |
 +
फिर साथ-साथ विधि के संग में,उन नाम की माला जपते हैं ||
 +
विघ्नों का शीघ्र शमन होकर, सब व्याधि व्यथाएँ नश जातीं |
 +
सुख सम्पति संतति बढ़े सदा,[[आत्मा]] में परम शांति आती ||१||
 +
-दोहा-
 +
चालीसा विधिवत पढ़े , चालिस चालिस बार |
 +
[[राहू ग्रह]] के कष्ट से,वो हो जाता पार ||१||
 +
 +
[[चित्र:Graphics-christmas-candles-814650.gif|center|100px]]
 +
</center></poem>
 +
[[नवग्रह अरिष्टनिवारक नव तीर्थंकर चालीसा|नवग्रह सम्बंधित अन्य चालीसा पढें]]
 +
 +
[[:श्रेणी:चालीसा|अन्य सभी चालीसा पढ़ें]]
 +
</div>

२३:२१, २४ जनवरी २०२० के समय का अवतरण

राहुग्रहारिष्टनिवारक श्री नेमिनाथ चालीसा


 -दोहा-
नेमिनाथ भगवान को, वंदन बारम्बार |
उनके वचनामृत सभी, भविजन को सुखकार ||१||
स्वात्मनिधी को प्राप्त कर,किया आत्मकल्याण |
चालीसा के पाठ से,जिनवर का गुणगान ||२||
-चौपाई –
जय जय जय श्री नेमि जिनेश्वर, कहलाए प्रभु तुम परमेश्वर ||१||
गर्भ में माता के जब आए, सोलह स्वप्न उन्हें दिखलाए ||२||
धनकुबेर करता है वृष्टी, पन्द्रह महिने तक नित होती ||३||
श्रावण शुक्ला छठ तिथि पावन,धन्य शिवादेवी का आँगन ||४||
राजा समुद्रविजय हरषाए , शौरीपुर में खुशियाँ छाएं ||५||
तीन लोक में आनंद छाया, स्वर्ग से इन्द्र सपरिकर आया ||६||
मेरु सुदर्शन पर ले जाकर, कलशे खूब ढुराए प्रभु पर ||७||
नीलकमल सम सुन्दर काया, बालपने से यौवन आया ||८||
राजुल के संग ब्याह करन को, चले प्रभू जब जूनागढ़ को ||९||
पशुओं की चीत्कार सुनी जब, तत्क्षण हुए विरागी जिनवर ||१०||
श्रावण सुदि छठ की शुभ तिथि में, सहस्राम्र वन में प्रभु पहुचे||११||
नमः सिद्ध कह दीक्षा ले ली, आत्मरमण की शिक्षा दे दी ||१२||
बाल ब्रम्हचारी वे जिनवर, वीतराग सर्वज्ञ हितंकर ||१३||
आश्विन सुदि एकम की तिथि में, ऊर्जयंतगिरि पर जा तिष्ठे ||१४||
प्रभु को केवलज्ञान हो गया, आत्मा का उत्थान हो गया ||१५||
धनद ने समवशरण रचवाया, दिव्यध्वनि सुन् जग हरषाया ||१६||
राजुल ने जब सुनी ये घटना, फ़ेंक दिया श्रृंगार फिर पुनः ||१७||
बहुत दुखी हो रोती जाती, ऊर्जयंतगिरि चढ़ती जाती ||१८||
उपदेशामृत पान कर लिया, संयम का शुभ मार्ग लख लिया ||१९||
दीक्षा ले गणिनी कहलाईं, सच्ची प्रभु से प्रीति लगाई ||२०||
समवशरण में कमलासन पर, चतुरंगुल भी रहें प्रभु अधर ||२१||
चारों दिश में मुख है दिखता, तभी जगत है ब्रम्हा कहता ||२२||
समवशरण का वैभव न्यारा, ग्रंथों में है वर्णन सारा ||२३||
ऊर्जयंतगिरि पर्वत से ही, मोक्ष पधारे त्रिभुवनपति जी ||२४||
लोकशिखर पर आन विराजे, नेमिनाथ जिनराज हमारे ||२५||
वे तो वीतराग जिनदेवा, किन्तु करे जो भक्ती सेवा ||२६||
उनके मनवांछित फल जाते, रोग,शोक,भय,व्याधि भगाते ||२७||
आतमज्ञान उन्हें मिल जाता,भवि निज पर कल्याण कराता ||२८||
राहूग्रह के स्वामी तुम हो, मेरे सभी अमंगल हर लो ||२९||
ग्रह का चक्र अनादिकाल से, प्राणी को भटकाता जग में ||३०||
जन्मकुंडली में यदि यह ग्रह, अशुभ जगह पर हो जाते हैं ||३१||
प्राणी को पीड़ा देते हैं, जीव दुखी तब ही होते हैं ||३२||
अगर उच्च स्थान पे होते, सुख,समृद्धि सभी दे देते ||३३||
स्वस्थ शरीर मिले धन सम्पति,और साथ में यशकीर्ती भी ||३४||
राहू ग्रह की बढ़े असाता, तन में है बहु रोग सताता ||३५||
धर्म में रुचि नहिं बढ़ पाती है,मन में शांति न हो पाती है ||३६||
नेमीप्रभु की जपते माला, वे पाएंगे सौख्य निराला ||३७||
प्रभु भक्ती से पाप कटेंगे,ग्रह भी उच्च और शुभ होंगे ||३८||
सांसारिक दुःख से घबराया, अतः आपकी शरण में आया ||३९||
परम क्रपालु दया अब कर दो,राहू ग्रह की बाधा हर लो||४०||
-शम्भू छंद –
श्री नेमिनाथ का चालीसा, जो चालीस दिन तक पढ़ते हैं |
फिर साथ-साथ विधि के संग में,उन नाम की माला जपते हैं ||
विघ्नों का शीघ्र शमन होकर, सब व्याधि व्यथाएँ नश जातीं |
सुख सम्पति संतति बढ़े सदा,आत्मा में परम शांति आती ||१||
-दोहा-
चालीसा विधिवत पढ़े , चालिस चालिस बार |
राहू ग्रह के कष्ट से,वो हो जाता पार ||१||

Graphics-christmas-candles-814650.gif

नवग्रह सम्बंधित अन्य चालीसा पढें

अन्य सभी चालीसा पढ़ें