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==<center><font color=brown>'''नवनिधि व्रत'''</font color></center>==
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==<center><font color=brown>'''पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी का परिचय'''</font color></center>==
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हस्तिनापुर में भगवान शांतिनाथ, भगवान कुंथुनाथ एवं भगवान अरनाथ ये तीन तीर्थंकर जन्मे हैं। ये तीनों ही तीर्थंकर तीन-तीन पद के धारक हुए हैं। ये ही इन तीनों तीर्थंकर भगवन्तों की एवं हस्तिनापुर तीर्थ की विशेषता है। इन तीनों तीर्थंकरों के तीन-तीन पदों की अपेक्षा यह ‘नवनिधि व्रत’ किया जाता है। इस व्रत के प्रभाव से नवनिधि-ऋद्धि से भंडार भरेगा। सर्व लौकिक संपत्ति के साथ-साथ अलौकिक आध्यात्मिक संपत्ति भी प्राप्त होगी।<br />
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आदिब्रह्मा भगवान [[ऋषभदेव]] की जन्मभूमि [[अयोध्या]] और उसके आस-पास के क्षेत्र को भी अवध के नाम से जाना जाता है । वैसे इन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और उनके प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् [[भरत]] के समय वह अयोध्या नगरी १२ योजन लम्बी थी अत: ९६ मील होने से लखनऊ, टिकैतनगर, त्रिलोकपुर, बाराबंकी, महमूदाबाद आदि नगर उस समय अयोध्या नगरी की पवित्र भूमि की सीमा में विद्यमान थे । वस्तुत: आज भी अयोध्या तीर्थ की पवित्रता से सम्पूर्ण अवध का वातावरण सुवासित, धर्मपरायण एवं परम पवित्र है ।
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<font color=blue>'''व्रत की उत्तम विधि-'''</font color>आषाढ़, कार्तिक और फाल्गुन मास में आष्टान्हिक पर्व में एक दिन पहले सप्तमी से पूर्णिमा तक नवदिन व्रत करना-उत्तम विधि नव उपवास करना, मध्यम में अल्पाहार और जघन्य में एकाशन-एक बार शुद्ध भोजन करना है। व्रत के दिन भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ तीर्थंकरों की समुच्चय पूजन या पृथक्-पृथक् पूजन करके उनके जीवन चरित्र को पढ़ना है।
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==<center><font color=blue>'''अवधप्रान्त के महमूदाबाद में हुआ था  जन्म'''</font></center>==
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उसी अवधप्रान्त के जिला सीतापुर के अन्तर्गत महमूदाबाद नामक एक नगर है, जहाँ विशाल जिनमंदिर के निकट वर्तमान में ६०-७० जैन घर हैं । उसी नगरी में एक सुखपालदास जी नाम के श्रेष्ठी निवास करते थे । अग्रवाल जातीय लाला सुखपालदास जी की धर्मपत्नी का नाम मत्तोदेवी था । पूरे नगर में धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध सुखपालदास जी भगवान की नित्य पूजन के साथ-साथ स्वाध्याय भी करते थे । सात्त्विक प्रवृत्ति वाले इन महामना श्रावक की धर्मपत्नी भी पतिव्रता आदि गुणों से सहित धर्मपरायण एवं अत्यन्त सरल प्रकृति की थीं।
 
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[[नवनिधि व्रत|पूरा पढ़ें...]]</center>
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[[पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी का परिचय|पूरा पढ़ें...]]</center>
 
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२२:०४, ३० नवम्बर २०२० का अवतरण

नवनिधि व्रत


पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी का परिचय

Bhi 770.jpg

आदिब्रह्मा भगवान ऋषभदेव की जन्मभूमि अयोध्या और उसके आस-पास के क्षेत्र को भी अवध के नाम से जाना जाता है । वैसे इन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और उनके प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् भरत के समय वह अयोध्या नगरी १२ योजन लम्बी थी अत: ९६ मील होने से लखनऊ, टिकैतनगर, त्रिलोकपुर, बाराबंकी, महमूदाबाद आदि नगर उस समय अयोध्या नगरी की पवित्र भूमि की सीमा में विद्यमान थे । वस्तुत: आज भी अयोध्या तीर्थ की पवित्रता से सम्पूर्ण अवध का वातावरण सुवासित, धर्मपरायण एवं परम पवित्र है ।

अवधप्रान्त के महमूदाबाद में हुआ था जन्म

उसी अवधप्रान्त के जिला सीतापुर के अन्तर्गत महमूदाबाद नामक एक नगर है, जहाँ विशाल जिनमंदिर के निकट वर्तमान में ६०-७० जैन घर हैं । उसी नगरी में एक सुखपालदास जी नाम के श्रेष्ठी निवास करते थे । अग्रवाल जातीय लाला सुखपालदास जी की धर्मपत्नी का नाम मत्तोदेवी था । पूरे नगर में धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध सुखपालदास जी भगवान की नित्य पूजन के साथ-साथ स्वाध्याय भी करते थे । सात्त्विक प्रवृत्ति वाले इन महामना श्रावक की धर्मपत्नी भी पतिव्रता आदि गुणों से सहित धर्मपरायण एवं अत्यन्त सरल प्रकृति की थीं।

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