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| style="background:transparent;"|'''नवनिधि व्रत'''<!-- शीर्षक यहां लिखें -->
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| style="background:transparent;"|'''रत्नों की खान आर्यिका श्री रत्नमती माताजी'''<!-- शीर्षक यहां लिखें -->
 
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२२:०९, ३० नवम्बर २०२० का अवतरण

रत्नों की खान आर्यिका श्री रत्नमती माताजी

पूज्य आर्यिका श्री रत्नमती माताजी का परिचय

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आदिब्रह्मा भगवान ऋषभदेव की जन्मभूमि अयोध्या और उसके आस-पास के क्षेत्र को भी अवध के नाम से जाना जाता है । वैसे इन प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव और उनके प्रथम पुत्र चक्रवर्ती सम्राट् भरत के समय वह अयोध्या नगरी १२ योजन लम्बी थी अत: ९६ मील होने से लखनऊ, टिकैतनगर, त्रिलोकपुर, बाराबंकी, महमूदाबाद आदि नगर उस समय अयोध्या नगरी की पवित्र भूमि की सीमा में विद्यमान थे । वस्तुत: आज भी अयोध्या तीर्थ की पवित्रता से सम्पूर्ण अवध का वातावरण सुवासित, धर्मपरायण एवं परम पवित्र है ।

अवधप्रान्त के महमूदाबाद में हुआ था जन्म

उसी अवधप्रान्त के जिला सीतापुर के अन्तर्गत महमूदाबाद नामक एक नगर है, जहाँ विशाल जिनमंदिर के निकट वर्तमान में ६०-७० जैन घर हैं । उसी नगरी में एक सुखपालदास जी नाम के श्रेष्ठी निवास करते थे । अग्रवाल जातीय लाला सुखपालदास जी की धर्मपत्नी का नाम मत्तोदेवी था । पूरे नगर में धर्मात्मा के रूप में प्रसिद्ध सुखपालदास जी भगवान की नित्य पूजन के साथ-साथ स्वाध्याय भी करते थे । सात्त्विक प्रवृत्ति वाले इन महामना श्रावक की धर्मपत्नी भी पतिव्रता आदि गुणों से सहित धर्मपरायण एवं अत्यन्त सरल प्रकृति की थीं।

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