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==<center><font color=#FF1493>'''अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर एवं दीपावली पर्व'''</font color></center>==
 
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१३:०३, १२ नवम्बर २०२० का अवतरण

अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर एवं दीपावली पर्व


अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर एवं दीपावली पर्व

Teerthankar janmbhuumi darshan132.jpg


जैनधर्म के अन्तिम चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म २६१८ वर्ष पूर्व बिहार प्रान्त के ‘‘कुण्डलपुर’’ नगरी के राजा सिद्धार्थ की महारानी त्रिशला की पवित्र कुक्षि से चैत्र शुक्ला त्रयोदशी तिथि में हुआ । वीर, महावीर, सन्मति, वर्धमान और अतिवीर इन पांच नाम से विख्यात तीर्थंकर महावीर बाल ब्रह्मचारी थे, जिनके गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान और मोक्ष इन पंचकल्याणकों को मनाकर सौधर्म इन्द्रादि देवों ने अपने को धन्य-धन्य माना था ऐसे प्रभु महावीर ने तीस वर्ष की युवावस्था में पूर्व भव के जातिस्मरण हो जाने से जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली और उनका प्रथम आहार ‘‘कूल ग्राम’’ में राजा कूल के यहां हुआ । दीक्षा के १२ वर्ष पश्चात् प्रभु को दिव्य केवलज्ञान की प्राप्ति हुई उसी बीच में किसी एक दिन भगवान महावीर ‘‘कौशाम्बी’’ नगरी में आहार के लिए पहुंचे । वहां राजा ‘चेटक’ की सबसे छोटी पुत्री ‘‘चन्दना’’ एक सेठानी के द्वारा सताई हुई साकलों में बंधी थी और कोदों का तुच्छ भोजन ग्रहण करती थी किन्तु भगवान महावीर को देखते ही उसने भक्तिपूर्वक उनका पड़गाहन किया जिसके प्रभाव से सारे बंधन टूट गए, वह वस्त्राभूषणों से सुन्दर हो गई और कोदों का चावल ‘‘शालि’’ धान्य में परिवर्तित हो गया पुन: चन्दना ने श्रद्धा सहित भगवान महावीर को आहारदान दिया और देवताओं ने उस समय रत्नवृष्टि कर दान का महत्त्व प्रर्दिशत किया । केवलज्ञान होने के पश्चात् ३० वर्षों तक उन्होंने सारे देश में भ्रमण कर जनता को दिव्य उपदेश दिया पुन: ७२ वर्ष की उम्र में बिहार की ‘‘पावापुरी’’ नगरी में कार्तिक कृष्णा अमावस्या के दिन समस्त कर्मों का नाशकर निर्वाण प्राप्त कर लिया । जैन पुराणों के अनुसार तब से ही ‘‘दीपावली पर्व’’ मनाया जाने लगा । भगवान महावीर के निर्वाण को आज २५४६ वर्ष हो गये हैं और वर्तमान में २५४७ वां वीर निर्वाण संवत् चल रहा है । श्री पूज्यपाद स्वामी ने निर्वाणभक्ति में, आचार्य श्रीगुणभद्र स्वामी ने उत्तरपुराण ग्रन्थ में,श्री समंतभद्र स्वामी ने स्वयंभूूस्तोत्र में उस पावापुरी तीर्थ की वन्दना की है और बताया है कि भगवान महावीर ने किस प्रकार कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की रात्रि के अंत में अघातिया कर्मों को नष्टकर निर्वाण पद प्राप्त कर लिया । हरिवंशपुराण में भी यही लिखा है एवं दीपावली पर्व तभी से प्रारम्भ हुआ ऐसा कहा है । उसमें कहा है कि भगवान के निर्वाणकल्याणक की भक्ति से युक्त संसार के प्राणी इस भरतक्षेत्र में प्रतिवर्ष आदरपूर्वक प्रसिद्ध दीपमालिका के द्वारा भगवान महावीर की पूजा करने के लिए उद्यत रहने लगे अर्थात् भगवान के निर्वाणकल्याणक की स्मृति में दीपावली पर्व मनाने लगे | वर्तमान परिप्रेक्ष्य में - भगवान के इस निर्वाणोत्सव दिवस अर्थात् दीपावली पर्व को भारतवर्ष में एक प्राचीन त्योहार के रूप में कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है, वह भारत के सबसे बड़े और सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण त्योहारों में से एक है । यह दीपों का पर्व है, आध्यात्मिक रूप मे यह अन्धकार पर प्रकाश की विजय को दर्शाता है । मात्र भारत में ही नहीं अपितु दुनिया के कई देशों में यह पर्व अत्यन्त धूमधाम से मनाया जाता है, इस पर्व का सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है । धनतेरस से लेकर भैया दूज तक चलने वाला ये पांच दिन का त्योहार है । दीपावली का शाब्दिक अर्थ है दीपों की अवली अर्थात् पंक्ति । इस पर्व को मात्र जैन धर्मावलम्बी ही नहीं अपितु हिन्दू, सिख, बौद्ध आदि भी मनाते हैं । इस दिन लोग घर, दुकान आदि की सफाई, मरम्मत, रंग-रोगन आदि कराकर सुन्दर रंगोली बनाते हैं और दीपक सजाकर एक दूसरे को मिष्ठान, मेवा आदि देकर परस्पर प्रेम का प्रदर्शन करते हैं । आध्यात्मिक महत्त्व - जहां जैन धर्मावलम्बी इसे भगवान महावीर के मोक्षदिवस के रूप में मनाकर निर्वाण लाडू चढ़ाते हैं, और चूंकि उसी दीपावली के दिन सायंकाल भगवान महावीर के प्रथम शिष्य गौतम गणधर को दिव्य केवलज्ञान की प्राप्ति हुई् अत: सायंकाल गौतम गणधर स्वामी, केवलज्ञान महालक्ष्मी की एवं सरस्वती माता की पूजा करते हैं तथा बही खाता आदि रखकर उस पर मंत्रोच्चारपूर्वक पूजन करते हैं, दीपमालिका सजाकर खुशियां मनाते हैं ।


क्रमशः...