01.मंगलाचरण-

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।।‘‘श्री ऋषभदेवाय नम: ।।ॐ श्री महावीराय नम:’’।।
।।‘‘श्री ज्ञानमती मात्रे नम:’’।।‘‘श्री रत्नमती मात्रे नम:’’।।
।।पद्मनंदि पञ्चिंवशतिका।।

मंगलाचरण
श्री नाभिराज सुत ऋषभ को कोटि कोटि प्रणाम।
पुन: ज्ञानमती मात का श्रद्धा से कर ध्यान।।
जिनने पढ़ इस ग्रंथ को किया आत्मकल्याण।
ऐसी माता मोहिनी को मेरा बारम्बार प्रणाम।।
(१)
श्री आदिनाथ तीर्थंकर बन कर्मों को नष्ट किया ऐसे।
इक पल में पवन झकोरे से सब काष्ठ समूह जले जैसे।।
उनकी ध्यानाग्नि सूर्य से भी थी अधिक तेज वाली देखो।
जयवंत रहे श्री ऋषभेश्वर विस्तीर्ण कायधारी थे वो।।
(२)
करने लायक कुछ कार्य नहीं इसलिए भुजाएं लटका दीं।
जाने को बची न कोई जगह इसलिए खड़े थे निश्चल ही।।
नहिं रहा देखने को कुछ भी इसलिए दृष्टि नासा पर की।
अत्यन्त निराकुल हुए प्रभो इसलिए उन्हें पूजें नित ही।।
(३)
जो रागद्वेष अरु अस्त्र शस्त्र विरहित अर्हंत जिनेश्वर हैं।
जो इन सबसे हो सहित देव रहता भयभीत निरन्तर है।।
वह क्या रक्षा कर सकता है हम सबकी जो खुद डरा हुआ।
इसलिए वीतरागी प्रभु के चरणों की मैंने शरण लिया।।
(४)
भगवन के चरण कमल जैसे धूली से रहित प्रभा वाले।
इंद्रों के मणिमय मुकुटों की आभा से लगते अति प्यारे।
ऐसे चरणों के वंदन से सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
हैं कमल अचेतन फिर भी प्रभु पदकमल तो पाप नशाते हैं।।
(५)
तीनों लोकों के जो स्वामी श्री शांतिनाथ भगवान हुए।
उनके पद में मैं नमन करूँ मन का संताप दूर करिए।।
देवों के नीलमणि से युत मुकुटों की जो कांती रहती।
लगता प्रभु के पदकमलों पर भ्रमरों की ही पंक्ति चलती।।
(६)
सब ज्ञाता दृष्टा त्रिभुवन के और क्रोध लोभ से रहित प्रभो।
सत् वचन बोलने वाले वे जिनदेव सदा जयवंत रहो।।
वे मोक्षगमन करने वाले प्राणी के लिए खिवैया हैं।

उत्कृष्ट धर्म को बतलाया जिससे तिरती हर नैया है।।