06.शुध्दात्मा की परिणति रूप धर्म का कथन

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शुद्धात्मा की परिणति रूप धर्म का कथन



(१०७)
जो निर्मल शील व गुणस्वरूप समता से युक्त अवस्था है।
अरु अनंत चतुष्टयमय अमृत सरिता के भीतर रहता है।।
उसको दुष्कर संसार दु:खरूपी अग्नी नहिं जला सके।
ऐसी शुद्धात्मा की परिणति रूपी आत्मा को नमन करें।।
(१०८)
कर्मादि वैरियों के नाशक तन का भी आश्रय नहीं रहा।
ऐसी शुद्धात्मा सूर्य चंद्र अग्नी से जिसका तेज बड़ा।।
उसके आगे सब पर पदार्थ क्षण भर में ऐसे अस्त हुए।
चैतन्य स्वरूपी तेज पुंज को नमस्कार कर धन्य हुए।।
(१०९)
नहिं जन्म मरण अरु जरा रोग कर्मों का भी संबंध नहीं।
है सदा प्रकाशित प्रभु आत्मा स्वात्मैक ज्ञान का धारी ही।।
जिनकी न किसी से उपमा हो सकती ऐसे उन सिद्धों की।
मैं शरण गहूँ रक्षा करिए जो अविनाशी पद धरते भी।।
(११०)
इस चिच्चैतन्य आत्मा का िंकचित वर्णन जो किया मैंने।
उसमें न कोई छल किया अत: अल्पज्ञानी मुझको समझे।।
क्योंकी सब कर्मों के नृप मोहनीय अंतराय शत्रू।
दर्शन ज्ञानावरणी चारों ये मेरे संग में लगे प्रभू।।
(१११)
विद्वान मानते अपने को शृंगारादिक के व्याख्याता।
प्रिय वचनों के आडम्बर से सन्मार्ग भुला दे जो वक्ता।।
इस दुनिया में हैं बहुत लोग ऐसे भाषण देने वाले।
पर सम्यग्ज्ञानप्रणेता जो वे दुर्लभ हैं देखे जाते।।
(११२)
यह रागद्वेष माया आदिक सबके स्वभाव से होते हैं।
इसलिए काव्य यदि ऐसा हो जो मन के मल को धोते हैं।।
उस वीतरागता के वर्णन का काव्य सदा फल देता है।
शृंगार आदि रस काव्य सदा प्राणी को दुख ही देता है।।
(११३)
मोहान्धकार से व्याप्त जगत में मोही अज्ञानी घूमें।
उनको न दिखाई कुछ पड़ता उस पर यदि दुर्जन कथा सुनें।।
आचार्य हमें समझाते हैं सत्पुरुषों की संगती करें।
आँखों में धूलि डालने वालों से सदैव ही दूर रहें।।
(११४)
यह तन विष्टा मूत्रादिक नाना कीड़ों से युत भरा हुआ।
अरु प्रबल घृणाकारी अस्थी मज्जा रजवीर्य से पुष्ट हुआ।।
ऐसे ही मल से बना हुआ जो कवी कुमाता से जन्मा।
वह नारी को जब चंद्रमुखी कहते हैं तो आश्चर्य घना।।
(११५)
स्त्री के केश जुओं के घर मुख हाड़ समूह चाम्र वेष्टित।
और मांसिंपड सम स्तन है, अरु उदर आदि विष्ठा पूरित।।
खम्भे की तरह पैर दोनों जिन स्थानों पर टिके हुए।
अत्यन्त घृणित इस काया में निंह विद्वतजन हैं राग करें।।
(११६)
यह कामदेव रूपी धीवर उत्कृष्ट धर्म नदि से बाहर।
हैं जीवरूप मछली उसको पकड़े काटें में लटकाकर।।
भू पर भूंजे बस उसी तरह, नारी के जाल में पंâस करके।
संभोगरूप भू पर भूंजें, ज्ञानीजन इससे दूर रहें।।
(११७)
जितने दुनिया में दोष कहे वे सभी अहित ही करते हैं।
पर सबसे बड़ा अहितकारक नारी के रूप को कहते हैं।।
इनसे अति मोह उत्पन्न होकर नाना प्रकार दुख सहते हैं।
क्रोधादि कषाय बने दुर्जय भवदधि को निंह तर सकते हैं।।
(११८)
जिस तरह कबूतर आदिक खग दाना देकर पकड़े जाते।
उस तरह विषय के जाल में भोले प्राणी हैं फांसे जाते।।
इसलिए इन्हें दुख का कारण लख विद्वतजन नहिं पंâसते हैं।
कांक्षा न करें वे विषयों की अतएव सुखी वे रहते हैं।।
(११९)
जैसे कोई बैरी जिस पर मंत्रादिक का उपयोग करे।
विपरीत बुद्धि हो जाती है नाना आपत्ति आदि भोगे।।
वैसे ही मोहरूप बैरी उसके प्रयोग से विषयों में।
होकर प्रवृत्त दुख सहें सभी सुख मानें चंचल भोगों में।।
(१२०)
भवरूपी घने जंगलों में यह मोहरूप ठग बैठे हैं।
जो स्त्री क्रोध मान माया से सबको ठगते रहते हैं।।
इसलिए ज्ञानरूपी आत्मा का ही आश्रय लेना चहिए।
आचार्य प्ररूपण करते हैं बस निज में ही रमना चहिए।।
(१२१)
मैं ज्ञानी अरु मैं धनी बहुत इस तरह मूर्ख समझा करते।
और चंचल बिजली के समान पुत्रादिक को अपना कहते।।
जबकी कुछ भी निंह स्थिर है यह सभी लोग हैं देख रहे।
इसलिए मोह को वश में कर आचार्य हमें सम्बोध रहे।।
(१२२)
क्या करें कहाँ जाएं वैâसे लक्ष्मी को प्राप्त करें वैâसे।
इस उलझन में हरदम प्राणी किस नृप की सेवा टहल करे।।
सब जान बूझकर भी ये मन ना किसी तरह भी समझ सके।
इसलिए ग्रंथकर्ता कहते यह मोह बहुत ही भ्रमित करे।।
(१२३)
हे बुद्धिमान ! तुम मोह तजो धन सदन पुत्र मित्रादिक से।
जिससे निंह जन्म दुबारा हो मिट जाये भ्रमण चौरासी से।।
क्योंकि उत्तम कुल जैनधर्म की शरण बहुत ही दुर्लभ है।
फिर मिले ना मिले पता नहीं जो मिला आज मानुष तन है।।
(१२४)
यह वीतराग अर्हंत देव की वाणी ही सद्वाणी है।
जो रागद्वेष से रहित और सब ज्ञाता दृष्टा ज्ञानी है।।
इसलिए भव्यजन मुक्ती की प्राप्ति के हेतु इसे मानो।
क्यों इधर उधर तुम फिरते हो अज्ञानी वचन असत् मानो।।
(१२५)
जो मूर्ख लोग जिन वचनों में संदेह हमेशा करते हैं।
अपनी जड़बुद्धि से हरदम वे बस असत् कल्पना करते हैं।।
जैसे जन्मांध पुरुष पक्षी की गणना में यदि बहस करे।
तब नेत्र सहित मानव वैâसे उसकी बातों से सहज रहे।।
(१२६)
श्रुत के दो भेद कहे प्रभु ने जो अंग बाह्यश्रुत रूपी हैं।
उसमें बारह भेदों से युत अंगश्रुत पढ़ते वे ज्ञानी हैं।।
और बाह्यश्रुत के हैं अनंत भेद उसमें जो ज्ञानमयी आत्मा।
उसको ही ग्रहण योग्य कहते तद्भिन्न त्याज्य है परमात्मा।।
(१२७)
इस पंचमकाल में ज्ञान आयु आदिक सब क्षीण हुए जानो।
इसलिए नहीं सब पढ़ सकते जो रत अभ्यासमयी मानो ।।
अभ्यास सदा जो किया करे वह मोक्षमार्ग का अभिलाषी।
यह श्रुताभ्यास ही मुक्तीपथ देता जो होता हितकारी।।
(१२८)
जो सूक्ष्म अगोचर है पदार्थ उनमें भी संशय नहीं करे।
जो दिव्यध्वनि जिनवचनों की उसको अवश्य स्वीकार करें।।
इस युग में जितने प्राणी हैं उनको निंह ज्यादा ज्ञान मिला।
इसलिए हमें परमागम से जो मिला समझिए बहुत मिला।।
(१२९)
चैतन्य बिना सब ज्ञानवान है शून्य कहा है भव वन में।
आत्मा के होने से पदार्थ में ज्ञान भान होता सच में।।
इसलिए भव्यजीवों को ऐसी सारभूत इस आत्मा में।
रमना चहिए बस इसमें ही और ध्यान करें शुद्धात्मा में।।
(१३०)
अज्ञानी प्राणी कोटि वर्ष में जितना तप कर कर्म नशे।
इक क्षण में नष्ट करे ज्ञानी स्थिर होकर जब ध्यान करे।।
यह आत्मा है चैतन्यरूप जितना बन सके करो तप को।
जिससे भव में नहिं आना हो, आत्मा सिद्धालय स्थित हो।।
(१३१)
यदि कर्म उदयरूपी समुद्र में कोई व्यक्ति जब गिर जावे।
जब तक नहिं मिले ज्ञानरूपी नौका निंह पार उतर पावे।।
नाना प्रकार आपत्ति रूप इसमें बैठे हैं मगरमच्छ।
इसको तिरने के लिए मिले जब ज्ञानरूप नौका नुवूâल१।।
(१३२)
मोहरूपी सघन अंधेरे में है व्याप्त त्रिलोकमयी मकान।
उसमें प्रवेश करने वाला जिनवच रूपी दीपक महान।।
तब ही पदार्थ का ज्ञान प्राप्त होगा क्या छोड़े ग्रहण करें।
वरना अज्ञान अंधेरे में यह प्राणी कुछ ना ढूंढ सके।।
(१३३)
जब कर्मों का उपशम होने से क्षेत्र काल शुभ योग बने।
तब आत्मा में हो लीन मनुज अपने निज का िंचतवन करे।।
संसार दुखों से छुड़वाए उसको ही धर्म कहा मुनि में।
इसके अतिरिक्त न कोई धर्म इससे तल्लीन रहे निज में।।
(१३४)
आत्मा के वास्तविक स्वरूप का वर्णन
निंह शून्य न जड़ निंह पंचभूत से आत्मा की उत्पत्ती है।
निंह कर्ता, एक न क्षणिक लोकव्यापी नहिं नित्य से बनती है।।
अपने शरीर परिमाण तथा रत्नत्रण गुण से शोभित है।
अपने ही कर्मों का कत्र्ता भोक्ता उत्पाद ध्रौव्य व्यय है।।
(१३५)
जो आत्मा को नहिं पहचाने वह वैâसी और कहाँ रहती।
यह प्रश्न पूछने वाली ही आत्मा में है जाग्रत बुद्धी।।
क्योंकी जड़ वस्तू में कोई भी प्रश्न विकल्प नहीं होते।
आत्मा का असली रूप समझ निज से कर्मों को क्षय करते।।
(१३६)
यद्यपि आत्मा नहिं र्मूितक है यह तन के अंदर रहता है।
प्रत्यक्ष नहीं दिखता फिर भी यह कर्ता और ये ज्ञाता है।।
इत्यादि विकल्पों से आत्मा का है अस्तित्व जगत भर में।
इसलिए इसे अनुभवन करो और मोह हटावो तुम मन से।।
(१३७)
यह व्यापक नहीं इसी हेतू तन के प्रमाण में रहता है।
इसका स्वभाव है ज्ञानरूप नहिं पंचतत्व से बनता है।।
सर्वथा नित्य अरु क्षणिक नहीं क्योंकि ना जन्म न मरण इसे।
यह एकरूप भी नहीं कही क्रोधादिक कई भाव इसमें।।
(१३८)
यह आत्मा शुभ और अशुभ कर्म से सुख दुख भोगा करता है।
ना कोई दूसरा है सुख दुख जो दे आगम यह कहता है।।
चिद्रूप आत्मा संसारी जीवन में कर्म सहित होता।
पर मोक्ष अवस्था में कर्मों से रहित त्रिलोकपती होता।।
(१३९)
आचार्य हमें समझाते हैं हे भव्य ! अगर तिरना चाहो।
तो एकचित्त होकर प्रमाण नय आदिक से इसको जानो।।
यह मोहरूप जो मगरमच्छ से सहित भवोदधि विकट बड़ा।
आत्मा के सिवा कोई वस्तु नहिं ग्राह्य यही मुनियों ने कहा।।
(१४०)
हे आत्मा ! जब तक मेरे संग कर्मों का बंधन लगा हुआ।
तब तक संसार रूप वैरी दुख देंगे यह ही कहा गया।।
यह रागद्वेष ही वैरी है यदि इनको तू तज सकता है।
तो मेरी आत्मा कर्मों के दुख से जल्दी छुट सकता है।।
(१४१)
इस लोक का ना तू लोक तेरा फिर क्यों प्रीति को धरता है।
यह सुख दुख अरु संतोष क्रोध तू व्यर्थ ही सबसे करता है।।
यह काया नश्वर इसीलिए अपने स्वरूप में रमण करो।
विषयों की आशा में रमकर मत दीन हीन सम भ्रमण करो।।
(१४२)
जहाँ प्रतिक्षण दुख ही दुख रहता ऐसी तिर्यंच नरकगति में।
निंह जाना पड़े मगर सुरगति में लक्ष्मी रहती चरणों में।।
उस देवगति से भी जब आयू पूर्ण होए तब दुख होता।
इसलिए हमेशा अविनाशी पद प्राप्ती में ही सुख मिलता।।
(१४३)
हे मन् ! तूने दुख बहुत सहे स्त्री आदिक से न ममता कर।
इन बाह्य पदार्थों में चेतन तू िंकचित भी अनुराग न कर।।
श्री परमगुरू से दुखों के नाशक ऐसा उपदेश सुनो।
जिससे मुक्ति की प्राप्ति हो और अंतरंग में प्रवेश करो।।
(१४४)
आचार्य और भी कहते हैं यदि आत्म रमण की इच्छा है।
तो हे भव्यों ! इंद्रिय सुख को कर त्याग धार लो दीक्षा है।।
कोलाहल में क्या रखा है सारे परिग्रह का त्याग करो।
और चंचल मन को स्थिर कर एकांतवास का स्वाद चखो।।
(१४५)
।।जीव और मन का परस्पर संवाद।।
रे मन तू वैâसे रहता है वह बोला िंचतित रहता हूँ।
ये िंचता रागद्वेष वश से बस इसमें ही रत रहता हूँ।।
जो इष्ट अनिष्ट समागम से होता है वैâसे इन्हें तजूं।
तब जीव कहे रे मन सब तज नरकों के दुख मैं क्यों भोगूं।।
(१४६)
जिसके स्मरण मात्र से ही मोहांधकार भग जाता है।
अरु सम्यग्ज्ञान उदित होता आनंद हृदय में छाता है।।
कृतकृत्यपने की प्राप्ती से आत्मा की शक्ती पहचानो।
निज में ही आत्मा रहती है तुम व्यर्थ न भटको यह जानो।।
(१४७)
इस जग में जीव अजीव रूप नाना प्रकार के बंधन में।
हो वशीभूत इस मोहकर्म के राग द्वेष रखता मन में।।
इससे ही हम चिरकालों तक दुख भोग रहे हैं इस जग में।
सब जान बूझकर पर पदार्थ में बुद्धी रहती है सच में।।
(१४८)
मलमूत्रादिक के घर स्वरूप इस तन से सदा भिन्न हूँ मैं।
मन के विकल्प अरु शब्द आदि रस से भी सदा पृथक््â हूँ मैं।।
मैं शांत और आनंदरूप चैतन्यात्मा में स्थित हूँ।
आरंभ परिग्रह छोड़ के मैं संसार से भी भयभीत न हूँ।।
(१४९)
।।इस विचार से संसार से भय का निवारण।।
निंह तुम्हें प्रयोजन लोक और उसके आश्रय से जो पदार्थ।
निंह तुझे प्रयोजन द्रव्य और इंद्रिय संबंधी अशुभ भाव।।
सब पुद्गल की पर्याय कही तू तो चैतन्य स्वरूपी है।
फिर क्यों दृढ़ बंधन बांध रहा तू दर्शन ज्ञान स्वरूपी है।।
(१५०)
जिसके मन में ऐसे विचार उत्पन्न हो गये ज्ञानी है।
जो भोगों के सुख अशुभ मान आत्मा के सुख सुख माने हैं।।
लेकिन इसकी विपरीत अवस्था अज्ञानी की होती है।
जो भोगे गये भोग उनकी ही हरदम स्मृति रहती है।।
(१५१)
जिस तरह खाज के रोगी को अग्नि से सेक कर सुख मिलता।
लेकिन वह दुख ही देता है निंह रोग नष्ट उससे होता।।
बस उसी तरह से क्षुधा तृषा से पीड़ित प्राणी होता है।
खाने पीने में सुख माने पर क्षणभंगुर सुख होता है।।
(१५२)
जब यह आत्मा अपने स्वरूप को देख वही चेष्टा करता।
उसमें ही होकर लीन उसी में खुद को आनंदित करता।।
अपने ही हित में सुख माने अपना ही संबंधी होता।
ऐसी प्रवृत्ति ही आत्मा की इसके अतिरिक्त न कुछ होता।।
(१५३)
जिस तरह भ्रमर सब पुष्पों में इक कमलपुष्प को चुनता है।
वैसे ही योगीजन विकल्प तजकर निज में ही रमता है।।
क्योंकि मनरूपी भ्रमर एक क्षण में ना जाने कहाँ कहाँ।
उड़कर चल देता है उसको ज्ञानीजन वश में करें अहा।।
(१५४)
जो शुद्धात्मा में रम जाते उनको सारे रस विरस लगें।
स्त्री पुत्रादिक कथा दूर तन से भी प्रीति नहीं रहे।।
हो जाते वचन मौन उनके मन से रागादिक नष्ट हुए।
ऐसे भव्यों के लिए कहा शुद्धात्मा में ही मगन रहें।।
(१५५)
जो दर्शन ज्ञानमयी आत्मा निंह उससे भिन्न मेरा कुछ भी।
ऐसी हो गयी बुद्धि निर्मल पर से छूटी परिणति मन की।।
फिर ग्राम नगर वन एक सदृश सबमें सुख दुख का नहिं आना।
आत्मा में हो तल्लीन यही उत्कृष्ट कही आराधना।।
(१५६)
आचार्य और भी कहते हैं यदि इंद्रिय का शुद्धात्मा से।
संबंध रहा तो व्यर्थ कहा तप करना बाह्य वस्तुओं से।।
हो गये जुदा या बंधे हुए शुद्धात्मा से या नहीं रहे।
तब भी तप करना व्यर्थ कहा जब तक अंतर में ममत्व रहे।।
(१५७)
यद्यपि नय शुद्ध है ग्रहण योग्य व्यवहार बिना कुछ ना होता।
इसलिए शुद्धनय की व्याख्या व्यवहार से ही करना होता।।
व्यवहार बिना निश्चयनय का निंह कोई प्रयोजन रह जाता।
इन दोनों को संग लेकर ही साधक मुक्ती का पथ पाता।।
(१५८)
व्यवहारनयापेक्षा आत्मा दर्शन अरु ज्ञान से भिन्न कहा।
अरु शुद्ध नयापेक्षा आत्मा निंह भिन्न सभी कुछ देख रहा।।
जो दर्शज्ञानमय आत्मा को गुण पर्यायों युत जान लिया।
उसने सब कुछ ही देख लिया अरु जान लिया अरु प्राप्त किया।।
(१५९)
ज्ञानीजन यह विचार करते रस गंधादिक पुद्गल विकार।
इससे मैं भिन्न न भीतर हूँ नहिं बाहर, हल्का वजनदार।।
निंह मोटा पतला और नहीं स्त्री नर और नपुंसक हूँ।
नहि शब्द वर्ण नहिं गणना हूँ मैं दर्शन ज्ञान स्वरूपी हूँ।।
(१६०)
मोहांधकार को तप द्वारा जब नाश करे केवलज्ञानी।
तब चिच्चैतन्य तेज को वे क्षण में जानें आनंदकारी।।।
वह तेज सूर्य और चंदा की आभा से अधिक प्रभाशाली।
ऐसा वह तेज त्रिलोकी में जयवंत रहे महिमाशाली।।
(१६१)
जिस तरह कर्म के वशीभूत नहिं साता और असाता है।
उनसे उत्पन्न विकल्प जाल नहिं होते वही विधाता हैं।।
वो मोक्षधाम में रहते हैं इंद्रादिक भी स्तुति करते।
उस पद को पाने हेतू हम भी उनकी शरण ग्रहण करते।।
(१६२)
जिनमें अज्ञानी सुख माने संताप मिटाती चंद्रकिरन।
कर्पूर मिला चंदन रस हो या स्त्री के हो कमल नयन।।
ज्ञानीजन ऐसे चंचल सुख को सदा सदा धिक्कार रहे।
बस गुरुओं के अमृतसम वचनों से ही शांती प्राप्त करें।।
(१६३)
जो योगीश्वर इस मोहरूप ठग से निज की रक्षा करते।
संसार रूप बड़वानल में जो इधर उधर घूमा करते।।
जैसे धनयुक्त पथिक कोई चोरों से निजधन रक्षा कर।
घर जाकर सुख अनुभवन करे वैसे ही करते योगी तब।।
(१६४)
धर्म की महिमा तथा धर्म के उपदेश
जो अब तक धर्म स्वरूप कहा वह धर्म बड़ा सुख देता है।
वह इंद्र तथा अहमिन्द्र और षट्खंड राज्य भी देता है।।
दुख का नाशक निर्वाणरूप प्रासाद की सीढ़ी है ये धरम।
इसका वर्णन केवली और गणधर ही कर सकते अपरम।।
(१६५)
हे भव्यजीव ! यदि जन्म जरा आदिक दुख से बचना चाहो।
संसार रूप जो महारोग उसको भी शमन करना चाहो।।
तो धर्म रसायन का आश्रय लेकर कषाय का त्याग करो।
मिथ्यात्व बड़ा दुखदायी है इसको न झांककर भी देखो।।
(१६६)
जैसे समुद्र में गिरा रत्न मिलना अत्यन्त कठिन होता।
दो काष्ठखंड जो अलग दिशा में बहकर गया नहीं मिलता।।
अंधे को निधि मिलना दुर्लभ वैसा ही दुर्लभ मनुष जनम।
यह दुर्लभ मनुष जनम पाकर भव्यों ! जिनधर्म करो धारण।।
(१६७)
अंधे के हाथ बटेर लगे वैसे ही मनुष जन्म मिलता।
पर इसको पाकर जो प्राणी खोटे गुरु देवों में रमता।।
उनके खोटे उपदेशों से जो विषय व्यसन में पंâसा रहा।
उसका निगोद राशी से मानव तन पाना भी व्यर्थ रहा।।
(१६८)
हे भव्यजीव ! बहु पुण्य उदय से मनुज जन्म ये तुझे मिला।
इसको पाकर अतिशीघ्र कोई हितकारी कारज करो भला।।
क्योंकि तिर्यंचगती में कोई ज्ञान नहीं दिलवा सकता।
इसलिए न खोटी गती मिले कर ले जो धर्म तू कर सकता।।
(१६९)
आचार्य और भी कहते हैं जो उत्तमकुल है तुझे मिला।
नरतन पाकर बहुपुण्य उदय से जैनधर्म भी तुझे मिला।।
इतना सब कुछ पाकर भी यदि निंह धर्ममार्ग अपनाओगे।
तो आया हुआ रत्न हाथों में खोकर व्यर्थ गवांओगे।।

(१७०)
शुभ धर्म कार्य करने हेतू है उम्र बहुत ही पड़ी हुई।
शारीरिक शक्ती धन आदिक है भोग भोगने हेतु मिली।।
आगे भविष्य में वृद्धावस्था में आराधन कर लेंगे।
यह ही विचार करते मूरख इक दिन मृत्यू को वर लेंगे।।
(१७१)
जो ज्ञानी हैं वे श्वेत केश लखकर विरक्त हो जाते हैं।
अज्ञानीजन जब उम्र बढ़े तो तृष्णा और बढ़ाते हैं।।
उनको वैराग्यजनित गुरु के उपदेश तनिक नहिं भाते हैं।
इस तरह मूर्ख अज्ञानीजन अपना संसार बढ़ाते हैं।।
(१७२)
हे तृष्णे तू है प्रिया मेरी आजन्म साथ रहने वाली।
तू प्रौढ़ा है मेरी स्त्री फिर तू वैâसे सहने वाली।।
यह दुष्ट जरा ने केश मेरे पकड़े हैं फिर भी तू चुप है।
इससे मेरा संबंध छुड़ा क्योंकी ये तेरी सौतन है।।
(१७३)
इस जग में रंक धनी होता और धनी रंक हो जाता है।
क्षण भर का पता नहीं कुछ भी बलवान मृत्यु पा जाता है।।
इसलिए नहीं विद्वान पुरुष धन जीवन का मद करता है।
ज्यों कमलपत्र पर ओसिंबदु अस्थिर सब वस्तु समझता है।।
(१७४)
प्राणी के प्राण मित्र सुत सब पत्ते पर पड़े ओस सम हैं।
चंचल हैं तथा इंद्रियों के सुख भी होते विष सदृश हैं।।
अक्षय सुख एक धर्म ही है पर मोही समझ न पाते हैं।
वह मोहजनित दुख की दाता वस्तू में सुक्ख मनाते हैं।।
(१७५)
जब तक राजा जीवित रहता तब तक सेना में जोश रहे।
तब तक तलवार शत्रुओं से लड़ने में खूब स्वरोष रहे।।
जब तक बलवान भुजाएँ हों तब तक प्राणी में कोप रहे।
पर कालबली जब डस जाए तब नहीं किसी को होश रहे।।
(१७६)
जैसे मल्लाह के जाल में पंâसकर भी मछली क्रीड़ा करती।
नहिं आगत दुख का भान उसे प्राणी की स्थिति भी वैसी।।
इस मृत्युरूप नाविक का जो भी बिछा हुआ है जाल प्रबल।
विषयों में फिर भी प्रीति करे नहिं नरकादिक गतियों का डर।।
(१७७)
यह मनुष क्षुधा को भोजन से और प्यास शीत जल पीकर के।
मंत्रों से भूत को शांत करे वैरीजन को दण्डादिक से।।
औषधि रोगादिक शांत करे पर मृत्यु का कोई उपाय नहीं।
उस पर यदि विजय प्राप्त करना, तो धर्म ही एक उपाय सही।।
(१७८)
जिस तरह हंस नामक पक्षी निर्मल जल में क्रीड़ा करते।
पंखों के बल पर इक सरवर से दूजे में रमते रहते।।
वैसे ही भव्य जीव रूपी ये हंस धर्म के पंखों से।
दुर्गति रूपी तालाबों को तज शोभित हों उत्तम पद में।।
(१७९)
यह मनुष धर्म के बल पर ही तीर्थंकर चक्रवर्ति बनते।
बलभद्र और इंद्रादिक बन उत्तम-उत्तम कीर्ती लभते।।
जो धर्मरहित वे निश्चय से नरकादिक दु:ख भोगते हैं।
यह सब कुछ जान समझकर भी क्यों धर्म न धारण करते हैं।।
(१८०)
जो सुन्दरता की खान कहा ऐसे स्वर्गों में भ्रमण करें।
जहाँ सुन्दर सुन्दर नंदनवन में देवांगना सह रमण करें।।
जिन इंद्रों की विमान पंक्ती में दिव्य पताकाएं शोभित।
ऐसे पद को पाने वाले होते हैं धर्मों से भूषित।।
(१८१)
षट्खंड और नवनिधियाँ भी मिलती हैं इसी धर्म से ही।
चौदह रत्नों के स्वामी बन मिले चौरासी लख हाथी भी।।
अठरह करोड़ घोड़े होते रथ बड़े मिले चौरासी लख।
छ्यानवे हजार स्त्रियों संग जीवन जीते हैं सुखपूर्वक।।
(१८२)
जो करे धर्म की रक्षा उन प्राणी की रक्षा धर्म करे।
इसके विनाश हो जाने पर धरती पर कुछ नहिं शेष रहे।।
योगीजन जिसका ध्यान करे मुक्ति पद को देने वाला।
यह धर्म सदा सच्चा साथी अनुपम सुख को देने वाला।।
(१८३)
नरकादि योनिरूपी जल में नाना दुख रूप तरंगे हैं।
उसमें शुभ अशुभ कर्मरूपी है मगर जिन्हें वह खाते हैं।।
जिसका निंह आदि अंत कोई ऐसे समुद्र में प्राणी को।
बस धर्मरूप नैया करती है पार अत: ध्यायें उनको।।
(१८४)
उत्तम कुल में हो जन्म तथा लावण्य, निरोग शरीर मिले।
आयू आदिक समस्त बातें इस धर्मकृपा से हमें मिलें।।
उत्तमलक्ष्मी और उत्तमसुख निर्मलगुण की प्राप्ती होती।
इसलिए धर्म का आराधन करते रहिए कह गए यती।।
(१८५)
भौंरा पुष्पित पुष्पों का आश्रय स्वयं प्राप्त कर लेता है।
वन में मृग को इच्छित जगहें नदि को समुद्रतल मिलता है।।
और हंस पक्षि को मानसरोवर स्वयं प्राप्त हो जाता है।
बस वैसे ही धर्मात्मा को यश संपति सब मिल जाता है।।
(१८६)
सौभाग्य कामिनी सुत सुख की यदि तुम अभिलाषा करते हो।
अथवा सुंदर घर लक्ष्मी को पाने की इच्छा रखते हो।।
सुन्दरता पाकर सब जग में प्रिय बनने की यदि इच्छा है।
तो सदा धर्म में स्थित हो तुम धारो गुरु की शिक्षा है।।
(१८७)
इसके प्रभाव से निर्जल जगहों में भी बने सरोवर हैं।
निर्जन जंगल में क्षण भर में बन जाते विशाल घर हैं।।
अब कहे कहाँ तक पुण्य उदय से सब वांछित मिल जाते हैं।
सुन्दरियों के संग बिन मांगे रत्नादिक भी मिल जाते हैं।।
(१८८)
इस पुण्य उदय से दूर गयी वस्तू भी प्राप्त हुआ करती।
जब अशुभ कर्म का उदय हुआ तो आकर के वापस जाती।।
मन में विचार तब आते हैं उसने मेरे संग बुरा किया।
पर वह निमित्त केवल बनता अपने कर्मों से दुखी हुआ।।
(१८९)
इस पुण्य उदय से अंधा अरु रोगी भी रूपवान होता।
निर्बल भी पुण्य उदय से ही शेरों सा पराक्रमी होता।।
बदसूरत कामदेव सा बन घर बैठे ही लक्ष्मी मिलती।
सब पुण्य उदय से दुर्लभ भी वस्तुएँ सुलभता से मिलतीं।।
(१९०)
यद्यपि हाथी बलवान तथा बाँधते महावत ही उनको।
बोझा लादें अंकुश मारें और वही चलाते हैं उनको।।
बस इसी तरह उत्तम पुरुषों पर नीच कुचेष्टा करते हैं।
इसे दुष्टकर्म की चाल समझ ज्ञानीजन इससे बचते हैं।।
(१९१)
इस धर्म की इतनी महिमा है जो सर्प हार बन जाते हैं।
पैनी तलवार पुष्पमाला विष भी अमृत बन जाते हैं।।
बैरी भी प्रीति दिखाता है सुरगण अधीन हो जाते हैं।
यह है कितना महिमाशाली आकाश रत्न बरसाते हैं।।
(१९२)
जो ग्रीष्मकाल में सूरज की ज्वालाओं से तप्तायमान।
कोमल शरीर के धारी को जब मिला हुआ पथ मरुस्थान।।
उसको यदि दैवयोग से मिल जाए हिमगिरि की फव्वारें।
बस उसी तरह का सुख समझो जब मिले धर्म की बौछारें।।
(१९३)
जैसे समुद्र में प्रलयकाल में उठता हुआ बवंडर हो।
उसमें भ्रमते जो मगरमच्छ आदिक जलजीव भयंकर हों।।

ऐसे समुद्र में गिरे हुए प्राणी को धर्म सहायक है।
नभ में विमान की रचनाकर अवलंब बने सुखदायक है।।
(१९४)
धर्मात्मा जन को इंद्र आदि अपने शिर पर धारण करते।
सुरनर किन्नरियाँ उनके गुण को भक्ति से गाया करते।।
धर्मात्मा पुरुषों की कीर्ती खुशबू की तरह पैâलती है।
इसलिए धर्म धारण करिए इससे लक्ष्मी भी मिलती है।।
(१९५)
लक्ष्मी को वश करने वाला अरु इच्छित फल देने वाला।
यह धर्म कल्पतरु सम यह सब िंचताओं को हरने वाला।।
यह पर्वत से उत्पन्न हुई नदियों की निर्मल धारा है।
इससे सब कार्य सिद्ध होते सुख मिलता अपरम्पारा है।
(१९६)
जो धर्म मार्ग पर गमन करे उसके सुख का तो कहना क्या।
जो केवल उसको सुन लेवे स्वामी त्रैलोक्य संपदा का।।
जैसे शीतल जल पीने से अथवा स्नान से सुख मिलता।
पर थके हुए प्राणी को शीतल सरवर का तट सुख देता।।
(१९७)
जिनके पद पंकज की रज से भव्यों को ज्ञान प्राप्त होता।
ऐसे श्री ‘‘वीरनंदि गुरु’’ को मैं श्रद्धा से वंदन करता।।
है यही याचना हे प्रभुवर ! मुझको भी मुक्ति प्रदान करो।
मेरे सब पाप शमन करके निज चरणों का आश्रय दे दो।।
(१९८)
परमानंद को देने वाला यह धर्म परम अमृत सम है।
संसार मार्ग से थके हुए प्राणी के लिए सुखासन है।।
यह पुण्यहीन को दुर्लभ है ऐसा ऋषियों ने कहा सदा।

‘‘श्री पद्मनंदि मुनि’’ के मुख से इतना धर्मामृत सार कहा।।