11.देशव्रतोद्योतन प्रश्नोत्तरी

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देशव्रतोद्योतन

प्रश्न २४४—सर्वज्ञ किसे कहते हैं ?
उत्तर—समस्त बाह्य तथा अभ्यंतर परिग्रह को छोड़कर शुक्लध्यान से चार घातिया कर्मों का नाश कर केवली अवस्था प्राप्त करने वाले सर्वज्ञ कहलाते हैं।

प्रश्न २४५—सर्वज्ञदेव के वचनों में सन्देह करने वाला क्या कहलाता है ?
उत्तर—सर्वज्ञदेव के वचनों में सन्देह करने वाला मनुष्य महापापी तथा अभव्य कहलाता है।

प्रश्न २४६—मोक्षरूपी वृक्ष का बीज क्या है ?
उत्तर—मोक्षरूपी वृक्ष का बीज सम्यग्दर्शन है।

प्रश्न २४७—संसार रूपी वृक्ष का बीज क्या है ?
उत्तर—संसार रूपी वृक्ष का बीज मिथ्यात्व है।

प्रश्न २४८—श्रावक के १२ व्रतों के अतिरिक्त और कौन—कौन से व्रत पालन करने योग्य हैं ?
उत्तर—श्रावक के १२ व्रतों के अतिरिक्त अष्ट मूलगुणों का पालन करना, रात्रि में चार प्रकार के आहार का त्याग करना, जल छानकर पीना और शक्त्यानुसार मौन आदि व्रतों को धारण करना चाहिए।

प्रश्न २४९—इन व्रतों का क्या फल है ?
उत्तर—इन व्रतों से भी महान पुण्य का बंध होता है।

प्रश्न २५०—सात शीलव्रत कौन से हैं ?
उत्तर—तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत यह सात शीलव्रत हैं।

प्रश्न २५१—चार प्रकार का आहार कौन—कौन सा है ?
उत्तर—खाद्य, स्वाद्य, लेह्य और पेय ये चार प्रकार के आहार हैं।

प्रश्न २५२—देशव्रत का धारी श्रावक किस रीति से व्रतों को धारण करता है ?
उत्तर—व्रती श्रावक अपने प्रयोजन के लिए स्थावरकाय के जीवों को मारता है, दो इन्द्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यंत समस्त त्रस जीवों की रक्षा करता है, सत्य बोलता है, अचौर्य व्रत का पालन करता है, स्वस्त्री का सेवन करता है, दिग्व्रत, देशव्रत, अनर्थदण्डव्रत का पालन कर सामायिक, प्रोषधोपवास तथा दान करता है और भोगोपभोग परिमाण व्रत स्वीकार करता है।

प्रश्न २५३—गृहस्थ के षट् आवश्यक कत्र्तव्यों में प्रमुख गुण कौन सा है ?
उत्तर—इनमें श्रेष्ठ मुनि आदि पात्रों को दान देना सबसे प्रधान गुण अर्थात् कत्र्तव्य है।

प्रश्न २५४—आहारदान की क्या महिमा है ?
उत्तर—रत्नत्रय की प्राप्ति निग्र्रंथ अवस्था में ही होती है जो शरीर द्वारा ही सम्भव है, शरीर की स्थिति अन्न से ही सम्भव है, वह अन्न धर्मात्मा श्रावकों द्वारा दिया जाता है, इस दु:षमकाल में मोक्षपदवी की प्रवृत्ति गृहस्थों के दिये हुए दान से होती है जिससे उनको महान पुण्य का संचय होता है।

प्रश्न २५५—औषधिदान की महिमा बताइये ?
उत्तर—धर्मात्मा श्रावकगण उत्तम दवा, पथ्य और निर्मल जल देकर मुनियों के शरीर को चारित्र के पालन करने के लिए समर्थ बनाते हैं इसलिए मुनिधर्म की प्रवृत्ति भी उत्तम श्रावकों से ही होती है और इस दान के फलस्वरूप प्रत्येक आत्मा का हित होता है।

प्रश्न २५६—ज्ञानदान की महिमा का वर्णन कीजिए ?
उत्तर—जो धर्मात्मा श्रावक शास्त्र का व्याख्यान करते हैं, पुस्तक लिखकर अथवा लिखवाकर देते हैं और पढ़ना—पढ़ाना इत्यादि ज्ञानदान में प्रवृत्त होते हैं उन श्रावकों को थोड़े ही काल में समस्त लोकालोक को प्रकाश करने वाले केवलज्ञान की प्राप्ति होती है।

प्रश्न २५७—अभयदान की क्या महिमा है ?
उत्तर—अभय का अर्थ भय का न होना होता है, आहार, औषध तथा शास्त्र ये तीनों ही अभयदान के आधीन हैं। विस्तीर्ण करुणा के धारी भव्य जीवों द्वारा जो समस्त प्राणियों के भय को छुड़ाकर उनकी रक्षा की जाती है उनको ज्ञानीजन अभयदान कहते हैं। अभयदान के बिना बाकी तीनों दान सर्वथा निष्फल हैं।

प्रश्न २५८—जिनमंदिर अथवा जिनप्रतिमा बनवाने का क्या पुण्य है
उत्तर—जो छोटे से छोटे बिम्बा (कुन्दुक) पत्ते के समान जिनमंदिर तथा जौ के समान जिनप्रतिमा बनवाता है उसके पुण्य की स्तुति साक्षात् सरस्वती भी नहीं कर सकती है फिर जो मनुष्य ऊँचे—ऊँचे जिनमंदिर और ऊँची—ऊँची जिनप्रतिमा बनवाता है उसका पुण्य अगम्य है।

प्रश्न २५९—अणुव्रती मरकर कौन सी गति में जाता है ?

उत्तर—अणुव्रती नियम से स्वर्ग जाते हैं और महान ऋद्धि के धारी देव होकर चिरकाल तक निवास करते हैं।