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अथ स्थलद्वयेन प्रश्नोत्तररूपेण द्वाभ्यां सूत्राभ्यां भव्यमार्गणाधिकारः कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले प्रश्नरूपेण ‘‘भवियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रमेकं । ततः परं द्वितीयस्थले प्रत्युत्तररूपेण ‘‘णत्थि ’’ इत्यादिना सूत्रमेकमिति पातनिका भवति।
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एवं प्रथमस्थले भव्याभव्यजीवानामन्तरकथनस्य प्रश्ने सूत्रमेकं गतं।
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तात्पर्यमेतत्-भव्याः कदाचिदपि न अभव्या भवितुमर्हन्ति न चाभव्या भव्याः भवितुमपि। अतएव ‘‘वयं भव्याः’’ इति निश्चित्य रत्नत्रयबलेन भव्यत्वशक्तिः प्रकटीकर्तव्या। तथैव एभिर्भव्यपुंगवैः भेदाभेदरत्नत्रय-माराध्य जन्मजरामरणदुःखानि विनिहत्य परमानन्दामृतं परमं धाम प्राप्तं त एव धन्यास्तेषां पादपयोरुहेषु वयं सततं प्रणिपतामः भक्तिभावेन।
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एवं द्वितीयस्थले भव्याभव्यानां निरन्तरत्वकथनमुख्यत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
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इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया अन्तरानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां भव्यमार्गणानाम एकादशोऽधिकारः समाप्तः। </poem>
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अब दो स्थलों में प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्रों के द्वारा भव्यमार्गणा अधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में प्रश्नरूप से ‘‘भवियाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: द्वितीय स्थल में प्रत्युत्तररूप से ‘‘णत्थि’’ इत्यादि एक सूत्र है। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।
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<font color=#FF4500>'''सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'''</font color>भव्य जीवों का और अभव्य जीवों का अन्तर कितने काल का होता है, ऐसा प्रश्न होने पर श्री भूतबली आचार्य उत्तर देते हैं।
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इस प्रकार प्रथम स्थल में भव्य और अभव्य जीवों के अन्तर कथन के प्रश्नरूप में एक सूत्र पूर्ण हुआ।
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===<center><font color=#8A2BE2>'''अब इन दोनों के अन्तर का उत्तरकथन करने वाला एक सूत्र अवतरित होता है-'''</font color></center>===
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<font color=#FF4500>'''सिद्धान्तचिंतामणिटीका'''</font color>-भव्य जीव कभी भी अभव्य नहीं हो सकते हैं और अभव्य भी कभी भव्य नहीं बन सकते हैं। इसलिए ‘‘हम भव्य हैं’’ ऐसा निश्चित करके रत्नत्रय धारण करके अपनी भव्यत्वशक्ति को प्रकट करना चाहिए तथा जिन भव्य पुंगवों-भव्य आत्माओं ने भेदाभेदरूप रत्नत्रय की आराधना करके जन्म-जरा-मृत्युरूप दु:खों को नष्ट करके परमानंदअमृतरूपी परम धाम को प्राप्त कर लिया, वे ही धन्य हैं, उनके चरणकमलों में हम भक्तिभावपूर्वक सदैव नमन करते हैं।
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इस तरह से द्वितीय स्थल में भव्य और अभव्य जीवों के निरन्तरपने का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।
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इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में भव्यमार्गणा नाम का ग्यारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

१०:०५, २ मई २०१५ के समय का अवतरण


भव्यमार्गणाधिकार

अथ भव्यमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन प्रश्नोत्तररूपेण द्वाभ्यां सूत्राभ्यां भव्यमार्गणाधिकारः कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले प्रश्नरूपेण ‘‘भवियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रमेकं । ततः परं द्वितीयस्थले प्रत्युत्तररूपेण ‘‘णत्थि ’’ इत्यादिना सूत्रमेकमिति पातनिका भवति।
इदानीं भव्यमार्गणायां अंतरकथनप्रश्नरूपेण सूत्रमवतरति-
भवियाणुवादेण भवसिद्धिय-अभवसिद्धियाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१३१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-भव्यजीवानामभव्यजीवानां चान्तरं कियच्चिरं कालात् भवति इति प्रश्ने सति श्रीभूतबलिसूरिवर्येण उत्तरयति।
एवं प्रथमस्थले भव्याभव्यजीवानामन्तरकथनस्य प्रश्ने सूत्रमेकं गतं।
अधुना अनयोरुत्तरकथनार्थं सूत्रमेकमवतरति-
णत्थि अंतरं णिरंतरं।।१३२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-भव्यजीवानामभव्यजीवानां परस्परं परिणमनाभावात् नास्त्यन्तरं अनयोः।
तात्पर्यमेतत्-भव्याः कदाचिदपि न अभव्या भवितुमर्हन्ति न चाभव्या भव्याः भवितुमपि। अतएव ‘‘वयं भव्याः’’ इति निश्चित्य रत्नत्रयबलेन भव्यत्वशक्तिः प्रकटीकर्तव्या। तथैव एभिर्भव्यपुंगवैः भेदाभेदरत्नत्रय-माराध्य जन्मजरामरणदुःखानि विनिहत्य परमानन्दामृतं परमं धाम प्राप्तं त एव धन्यास्तेषां पादपयोरुहेषु वयं सततं प्रणिपतामः भक्तिभावेन।
एवं द्वितीयस्थले भव्याभव्यानां निरन्तरत्वकथनमुख्यत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया अन्तरानुगमे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां भव्यमार्गणानाम एकादशोऽधिकारः समाप्तः।

अथ भव्यमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्रों के द्वारा भव्यमार्गणा अधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में प्रश्नरूप से ‘‘भवियाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: द्वितीय स्थल में प्रत्युत्तररूप से ‘‘णत्थि’’ इत्यादि एक सूत्र है। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अब भव्यमार्गणा में अन्तर बतलाने हेतु प्रश्नरूप से सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

भव्यमार्गणानुसार भव्यसिद्धिक और अभव्यसिद्धिक जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१३१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भव्य जीवों का और अभव्य जीवों का अन्तर कितने काल का होता है, ऐसा प्रश्न होने पर श्री भूतबली आचार्य उत्तर देते हैं।

इस प्रकार प्रथम स्थल में भव्य और अभव्य जीवों के अन्तर कथन के प्रश्नरूप में एक सूत्र पूर्ण हुआ।

अब इन दोनों के अन्तर का उत्तरकथन करने वाला एक सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

भव्य और अभव्य दोनों प्रकार के जीवों का अन्तर नहीं होता है अत: वे निरन्तर हैं।।१३२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भव्य जीव कभी भी अभव्य नहीं हो सकते हैं और अभव्य भी कभी भव्य नहीं बन सकते हैं। इसलिए ‘‘हम भव्य हैं’’ ऐसा निश्चित करके रत्नत्रय धारण करके अपनी भव्यत्वशक्ति को प्रकट करना चाहिए तथा जिन भव्य पुंगवों-भव्य आत्माओं ने भेदाभेदरूप रत्नत्रय की आराधना करके जन्म-जरा-मृत्युरूप दु:खों को नष्ट करके परमानंदअमृतरूपी परम धाम को प्राप्त कर लिया, वे ही धन्य हैं, उनके चरणकमलों में हम भक्तिभावपूर्वक सदैव नमन करते हैं।

इस तरह से द्वितीय स्थल में भव्य और अभव्य जीवों के निरन्तरपने का कथन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में भव्यमार्गणा नाम का ग्यारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।