"12.उचित व्यवसाय का महत्व" के अवतरणों में अंतर

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मनुष्य का भोजन कैसा व क्या हो इसके साथ ही यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं कि जिस धन से भोजन प्राप्त किया गया है वह धन कैसा है । महापुरुषों का कथन हैं कि ''' उद्देश्य के साथ-साथ उसकी प्राप्ति के साधन भी उत्तम होने चाहिए ।''' उत्तम साधन से कमाए हुए धन से प्राप्त भोजन ही अच्छी भावनाओं को जन्म देता है । दूसरों को दु:ख देकर प्राप्त हुए धन के भोजन से दु:ख ही प्राप्त होगा । वह भोजन कल्याणकारी न होकर अमंगलकारी व बुरे कर्मों की ओर प्रेरित करने वाला होगा । अत : भोजन के साथ ही हमारा व्यवसाय भी शुद्ध होना चाहिए । उचित रीति से प्राप्त हुआ धन अधिक स्थाई, सन्मार्ग पर ले जाने वाला व सुखकारी होता है । हिंसा, छल, कपट आदि से प्राप्त धन अस्थाई, दुर्व्यसनों में लगाने वाला व दुखकारी होता है । धन जिस गति से आता है उसी गति से जाता है । डाकू, स्मगलर व हिंसक व्यवसाय वाले नशीले पदार्थो के सेवन व अन्य दुर्गुणों में ही धन लुटाते हैं । उनके धन से प्राप्त भोजन कर उनकी संतान भी दुर्गुणों पर चलना सीखती है । यदि हम अपने चारों ओर दृष्टि डालें तो यह प्रत्यक्ष देखेंगे कि जिस परिवार ने गलत तरीकों से धन प्राप्त किया है, वह पनपता नहीं । उस परिवार के सदस्यों में दुर्व्यसन, नशीले पदार्थो का सेवन, रोग व आपसी झगड़े अधिक रहते हैं व आत्मसंतोष व शांति का अभाव रहता है ।
मनुष्य का भोजन कैसा व क्या हो इसके साथ ही यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं कि जिस धन से भोजन प्राप्त किया गया है वह धन कैसा है । महापुरुषों का कथन 'हैं कि '' उद्देश्य के साथ-साथ उसकी प्राप्ति के साधन भी उत्तम होने चाहिऐ '' उत्तम साधन से कमाए हुए धन से प्राप्त भोजन ही अच्छी भावनाओं को जन्म देता है । दूसरों को दु :ख देकर प्राप्त हुए धन के भोजन से दु :ख ही प्राप्त होगा । वह भोजन कल्याणकारी न होकर अमंगलकारी व बुरे कर्मों की ओर प्रेरित करने वाला होगा । अत : भोजन के साथ ही हमारा व्यवसाय भी शुद्ध होना चाहिए । उचित रीति से प्राप्त हुआ धन अधिक स्थाई, सन्मार्ग पर ले जाने वाला व सुखकारी होता है । हिंसा, छल कपट आदि से प्राप्त धन अस्थाई, दुर्व्यसनों में लगाने वाला व दुखकारी होता है । धन जिस गति से आता है उसी गति से जाता है । डाकू, स्मगलर व हिंसक व्यवसाय वाले नशीले पदार्थो के सेवन व अन्य दुर्गुणों में ही धन लुटाते हैं । उनके धन से प्राप्त भोजन कर उनकी संतान भी दुर्गुणों पर चलना सीखती है । यदि हम अपने चारों ओर दृष्टि डालें तो यह प्रत्यक्ष देखेंगे कि जिस परिवार ने गलत तरीकों से धन प्राप्त किया है, वह पनपता नहीं । उस परिवार के सदस्यों में दुर्व्यसन, नशीले पदार्थो का सेवन, रोग व आपसी झगड़े अधिक रहते हैं व आत्मसंतोष व शांति का अभाव रहता है ।
 
  
अपने व्यवसाय से धन तो वेश्या भी खूब कमा लेती है, किन्तु उसके यहाँ भोजन करना कितने लोग चाहेंगे? भोजन बनाने में प्रयोग किये जाने वाले पदार्थ तो उसके भोजन में भी वही होते हैं जो एक धार्मिक स्थल पर बनने वाले भोजन में होते हैं किन्तु धार्मिक स्थल वाले भोजन को प्रसाद समझा जाता है क्योंकि वह भोजन जिस धन से बना है वह श्रद्धा व उत्तम भावना से दिए हुए धन का है, किसी वासना पूर्ति या अन्याय द्वारा प्राप्त हुए धन का नहीं ।
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अपने व्यवसाय से धन तो वेश्या भी खूब कमा लेती है, किन्तु उसके यहाँ भोजन करना कितने लोग चाहेंगे ? भोजन बनाने में प्रयोग किये जाने वाले पदार्थ तो उसके भोजन में भी वही होते हैं जो एक धार्मिक स्थल पर बनने वाले भोजन में होते हैं किन्तु धार्मिक स्थल वाले भोजन को प्रसाद समझा जाता है क्योंकि वह भोजन जिस धन से बना है वह श्रद्धा व उत्तम भावना से दिए हुए धन का है, किसी वासना पूर्ति या अन्याय द्वारा प्राप्त हुए धन का नहीं ।
  
अत : सात्विक भोजन के साथ ही हमारा व्यवसाय भी शुद्ध होना चाहिये । जीव हिंसा करके अथवा करने में सहायक होकर कमाये हुए धन से प्राप्त भोजन कभी सुख, शांति व आरोग्य प्रदान नहीं करता अत : निम्न व्यवसायों से प्राप्त धन शुद्ध नहीं माना जाता ।
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अत: सात्विक भोजन के साथ ही हमारा व्यवसाय भी शुद्ध होना चाहिये । जीव हिंसा करके अथवा करने में सहायक होकर कमाये हुए धन से प्राप्त भोजन कभी सुख, शांति व आरोग्य प्रदान नहीं करता अत: निम्न व्यवसायों से प्राप्त धन शुद्ध नहीं माना जाता ।
  
. मांसाहारी पदार्थो के लिए पशु, पक्षियो आदि का वध करना या कराना ।
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*मांसाहारी पदार्थों के लिए पशु, पक्षियों आदि का वध करना या कराना ।
  
. तमाशे के लिए पशुओं, मुर्गों, बटेरों, सांडो आदि पशुओं को लड़ाना ।
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*तमाशे के लिए पशुओं, मुर्गों, बटेरों, सांडो आदि पशुओं को लड़ाना ।
  
. खाल चर्बी, फर व रेशम के वस्त्र, तेल, पक्षियों के परों से बनने वाली वे वस्तुएं बनाना जिनमें जीवित प्राणी की हत्या की जाती है ।
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*खाल चर्बी, फर व रेशम के वस्त्र, तेल, पक्षियों के परों से बनने वाली वे वस्तुएं बनाना जिनमें जीवित प्राणी की हत्या की जाती है ।
  
. पक्षियों को पकड़ कर कैद करना व उन्हें बेच कर धन कमाना ।
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*पक्षियों को पकड़ कर कैद करना व उन्हें बेच कर धन कमाना ।
  
. शराब आदि मादक वस्तुओं का व्यवसाय करना या करवाना ।
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*शराब आदि मादक वस्तुओं का व्यवसाय करना या करवाना ।
  
 
मांस के लिए जीव हत्या करने वाला मांस का व्यापार करने अथवा कराने वाला भी मांस खाने वाले के समान ही दोषी है ।
 
मांस के लिए जीव हत्या करने वाला मांस का व्यापार करने अथवा कराने वाला भी मांस खाने वाले के समान ही दोषी है ।

१६:४६, ८ जुलाई २०१८ के समय का अवतरण

उचित व्यवसाय का महत्व

मनुष्य का भोजन कैसा व क्या हो इसके साथ ही यह भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं कि जिस धन से भोजन प्राप्त किया गया है वह धन कैसा है । महापुरुषों का कथन हैं कि उद्देश्य के साथ-साथ उसकी प्राप्ति के साधन भी उत्तम होने चाहिए । उत्तम साधन से कमाए हुए धन से प्राप्त भोजन ही अच्छी भावनाओं को जन्म देता है । दूसरों को दु:ख देकर प्राप्त हुए धन के भोजन से दु:ख ही प्राप्त होगा । वह भोजन कल्याणकारी न होकर अमंगलकारी व बुरे कर्मों की ओर प्रेरित करने वाला होगा । अत : भोजन के साथ ही हमारा व्यवसाय भी शुद्ध होना चाहिए । उचित रीति से प्राप्त हुआ धन अधिक स्थाई, सन्मार्ग पर ले जाने वाला व सुखकारी होता है । हिंसा, छल, कपट आदि से प्राप्त धन अस्थाई, दुर्व्यसनों में लगाने वाला व दुखकारी होता है । धन जिस गति से आता है उसी गति से जाता है । डाकू, स्मगलर व हिंसक व्यवसाय वाले नशीले पदार्थो के सेवन व अन्य दुर्गुणों में ही धन लुटाते हैं । उनके धन से प्राप्त भोजन कर उनकी संतान भी दुर्गुणों पर चलना सीखती है । यदि हम अपने चारों ओर दृष्टि डालें तो यह प्रत्यक्ष देखेंगे कि जिस परिवार ने गलत तरीकों से धन प्राप्त किया है, वह पनपता नहीं । उस परिवार के सदस्यों में दुर्व्यसन, नशीले पदार्थो का सेवन, रोग व आपसी झगड़े अधिक रहते हैं व आत्मसंतोष व शांति का अभाव रहता है ।

अपने व्यवसाय से धन तो वेश्या भी खूब कमा लेती है, किन्तु उसके यहाँ भोजन करना कितने लोग चाहेंगे ? भोजन बनाने में प्रयोग किये जाने वाले पदार्थ तो उसके भोजन में भी वही होते हैं जो एक धार्मिक स्थल पर बनने वाले भोजन में होते हैं किन्तु धार्मिक स्थल वाले भोजन को प्रसाद समझा जाता है क्योंकि वह भोजन जिस धन से बना है वह श्रद्धा व उत्तम भावना से दिए हुए धन का है, किसी वासना पूर्ति या अन्याय द्वारा प्राप्त हुए धन का नहीं ।

अत: सात्विक भोजन के साथ ही हमारा व्यवसाय भी शुद्ध होना चाहिये । जीव हिंसा करके अथवा करने में सहायक होकर कमाये हुए धन से प्राप्त भोजन कभी सुख, शांति व आरोग्य प्रदान नहीं करता अत: निम्न व्यवसायों से प्राप्त धन शुद्ध नहीं माना जाता ।

  • मांसाहारी पदार्थों के लिए पशु, पक्षियों आदि का वध करना या कराना ।
  • तमाशे के लिए पशुओं, मुर्गों, बटेरों, सांडो आदि पशुओं को लड़ाना ।
  • खाल चर्बी, फर व रेशम के वस्त्र, तेल, पक्षियों के परों से बनने वाली वे वस्तुएं बनाना जिनमें जीवित प्राणी की हत्या की जाती है ।
  • पक्षियों को पकड़ कर कैद करना व उन्हें बेच कर धन कमाना ।
  • शराब आदि मादक वस्तुओं का व्यवसाय करना या करवाना ।
मांस के लिए जीव हत्या करने वाला मांस का व्यापार करने अथवा कराने वाला भी मांस खाने वाले के समान ही दोषी है ।