22.सुभाताष्टक स्तोत्र

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।।तृतीय अधिकार।।

अनित्यत्वाधिकार



।।सत्रहवाँ अधिकार।।
।। सुप्रभाताष्टक स्तोत्र।।
(१)
जिस उषाकाल में रात्री का सर्वथा अंत हो जाता है।
और नेत्र युगल खुल जाने से निद्रा का नाश हो जाता है।।
वैसे ही द्वय१ आवरणों के सर्वथा नाश हो जाने पर।
अरु अंतराय का क्षय होकर मोहनीय कर्म नश जाने पर।।
जो सम्यग्दर्शन ज्ञान प्रकट होने पर जो हो सुप्रभात।
जिन मुनियों ने वह प्राप्त किया उनको है मेरा नमस्कार।।
(२)
तीनों लोकों के अधिपति जिन के सुप्रभात को नमन करूँ।
जो सुप्रभात सब जीवों को सुख का दाता मल रहित प्रभू।।
और ज्ञानप्रभा से भासित सब ही लोकालोक प्रकाश भरे।
जो सुप्रभात इक बार उदित हो जाने से नवज्योति भरे।।
सब प्राणीगण को लगता है यह मेरा जीवन धन्य हुआ।
जिनवर की उस शुभ बेला को कर नमन हृदय अति मुदित हुआ।।
(३)
जिस प्रभाकाल में मानव अपनी धर्म क्रियाओं में लगते।
जो सुप्रभात उपमा विरहित सबका संताप दूर करते।।
जिस सुप्रभात के होने पर भय से एकांतमत्तवादी।
रूपी उल्लू नश जाते हैं और होती जिनभक्ती आदी।
उस स्तुति का जो कोलाहल जैसे प्रात: पक्षी चहके।
ऐसा सुप्रभात ताप हरके चंदन की खुशबू सम महके।।
(४)
जिन प्रभु के सुप्रभात का जो आंनदरहित गायन करते।
इसको सुरेन्द्र और सुंदरियाँ बंदीजन प्रात: हैं पढ़ते।।
राजा के सम्मुख अद्वितीय इस सुप्रभात का पाठ करे।
सुन गान नागकन्याओं का विद्याधर आदिक ठाठ करें।
तीनों लोकों को सुख प्रदान करने वाला यह सुप्रभात।
हम लोगों को भी सुख देवे हम वंदन करते जोड़ हाथ।।
(५)
जिन सुप्रभात की आभा से जग के सब पाप चोर भगते।
मन रूप चन्द्रमा मलिन तथा फीके होकर के हैं छुपते।।
अरु अनीति रूपी अंधकार छटने से दिशाएँ स्वच्छ हुर्इं।
फिर जिनवर का जो सुप्रभात उसकी उत्कृष्ट ज्योति प्रगटी।
जो सदाकाल रहने वाला सब भवि जीवों से वंदनीय।
इस लोक में भी जयवंत रहे सबके जीवन में दर्शनीय।।
(६)
अर्हंत देव का सुप्रभात प्रात: की बेला है लगती।
सबके दोषों को नश करके लोगों की दृष्टि स्वच्छ करती।।
जिन पुरुषों की विषयों में अति आसक्ति उन्हें बुद्धि देती।
स्त्रीविषयक जो राग और प्रीति के भाव को है नशती।
इसलिए गुरूजन कहते हैं इसकी महिमा अपूर्व होती।
प्रात: की बेला की उपमा इस पर नहिं पूर्ण घटित होती।।
(७)
यह सुप्रभात जहाँ सूर्य प्रभा भी नहीं उजाला कर सकती।
वहिं पर यह सुप्रभात भव्यों के मन का अंधकार हरती।।
यह सुप्रभात भूमंंडल में दिन पर दिन विकसित होता है।
और सूर्य रात्रि के उल्लू आदिक जीवों के सुख नशता है।
लेकिन जिनवर का सुप्रभात निंह कष्ट किसी को देता है।
यह समीचीन उपमा विरहित कल्याण सभी का करता है।।
(८)
जैसे प्रात: की सूर्य किरण कमलों को विकसित हैं करती।
वैसे ही केवलज्ञान रश्मियाँ भवि को आनंदित करती।।
जिस सुप्रभात में दुष्कर्मोदय रूपी निद्रा भग जाती।
और मोहनींद से जग करके प्रबुद्ध अवस्था है पाती।।
इसलिए कहें आचार्यप्रवर जो सुप्रभात अष्टक पढ़ते।
वह सभी अशुभ कर्मों को तज सुख तथा धर्मवृद्धी करते।।

।।इति सुप्रभाताष्टक स्तोत्र।।