22 अगस्त 2017 प्रवचन

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प्रात:काल पारस चेेैनल के प्रवचन ....22 अगस्त 2017 (मुंबई में)

आज प्रात:कालीन बेला में प्रज्ञाश्रमणी आर्यिका श्री चंदनामती माताजी ने उषा वंदना की पंक्तियों को अपनी मधुर वाणी से पारस टी.वी. के माध्यम से सभी दर्शकों को, भक्तों को जगाया। रात्रि के अंधकार को दूर करके सूर्य के प्रकाश से अपना दिवस मंगलमय करना । आपकी सुबह माताजी के दर्शन से होती है, यह बहुत ही हर्ष की बात है। पूज्य ज्ञानमती माताजी के सान्निध्य में जैनम हॉल में गर्भ संस्कार शिविर का आयोजन किया गया। डॉ. गीतांजलि शाह ने माताजी की प्रेरणा से शिविर का आयोजन ‘‘श्रावक संस्कार निर्देशिका’’ नाम की पुस्तक है, जो चंदनामती माताजी द्वारा संकलित है, गर्भ के संस्कार महिलाओं पर गर्भसंस्कार की क्रिया माताजी के मंत्रोच्चारणपूर्वक द्वारा हुई। लगभग १०० दम्पत्तियों ने इस कार्यक्रम में आकर संस्कार कराया। पूज्य चारित्रचन्द्रिका गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने सोलहकारण भावना में जो आवश्यक परिहाणि भावना हे, उस पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला। आचार्यदेव कहते हैं- साधुओं की ६ आवश्यक क्रिया मानी है, वे इसमें किसी प्रकार की हानि नहीं करते हैं, दोष नहीं लगाते हैं, निर्दोष पालन करते हुए जो अपनी चर्या का पालन करते हैं। अपनी आत्मा को परमात्मा बनाते हैं, ऐसी भावना को हम नमस्कार करते हैं। श्रावकों की भी ६ आवश्यक क्रिया मानी है। देव पूजा, गुरु की उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान। माताजी ने षट्टावश्यक का महत्त्व बहुत ही सुन्दर शब्दों में बताया। एक सूर्य मित्र ब्राह्मण थे, वह नदी में स्नान करके सूर्य को अघ्र्य दे रहे थे। उसकी अंगुलि से रत्नजड़ित अंगूठी गिर गई। वह ब्राह्मण घबरा गया बोला राजा तो हमको चोर समझेगा। उसने सोचा हम क्या करें। वह एक मुनि के पास गया वह था ब्राह्मण, परन्तु वह अवधिज्ञानी दिगम्बर जैन मुनि के पास गया। उसने नमस्कार करके अपनी समस्या बताई। मुनि ने कहा-ब्राह्मण, तुम्हारी अंगूठी वहीं पर कमल पत्ते पर पड़ी है, जहाँ तक सूर्य को अघ्र्य दे रहे थे। ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ। वह अंगूठी लेकर वापस आ गया। बोला महाराज आप मुझे भी यह विद्या सिखा दो। मुनि ने कहा! भव्यात्मन् तुम मेरे जैसे बन जाओ यह विद्या तुम्हें भी मिल जायेगी। उसने स्व्ीकार किया। दीक्षा ग्रहण कर ली। मुनि ने षट्आवश्यक क्रियाएँ बतार्इं। वह इतने निष्णात बन गये कि उन्होंने अनेक प्रकार की विद्या सिद्ध कर ली। मुनि ने कहा-शिष्य अब तुम घर जा सकते हो। वह मुस्कराएँ और बोले मुझे तो आत्मा की निधि को खोलने की विद्या मिल गई है। अब इन विद्यज्ञओं से मुझे कोई लेना-देना नहीं है। मुझे अब अपने घर नहीं, मुझे मोक्षमहलरूपी घर जाना है। यह है षटआवश्यक का महत्तव। आत्मा में जो रत्नत्रय से जड़ित अंगूठी थी, उसको प्राप्त करके उसने अपने मोक्षमार्ग की सिद्धि कर ली।

महानुभावों! मुनि बनकर के अपनी षट्आवश्यक क्रिया का पालन करके अपने मोक्षमार्ग प्रशस्त करना एवं जब तक मुनि न बन सको, तब तक श्रावक बनकर श्रावक की षट्क्रिया का पालन करके अपने गृहस्थ जीवन को सफल बनायें, यही मंगल आशीर्वाद है।